बांदा, के एस दुबे । इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और जब बात किसी की जिंदगी बचाने की हो, तो युवा वर्ग हमेशा आगे आता है। ऐसा ही एक दिल छू लेने वाला मामला जिला अस्पताल बाँदा से सामने आया है, जहाँ समय पर हुए रक्तदान के कारण एक गरीब गर्भवती महिला और उसके पेट में पल रहे जुड़वा बच्चों की जान बचा ली गई। इस नेक कार्य से एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ने से बच गया। जानकारी के अनुसार, बिजली खेड़ा निवासी दुर्गेश अपनी गरीब गर्भवती पत्नी श्रीमती गुड़िया को गंभीर हालत में जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि महिला के शरीर में खून की भारी कमी (ैमअमतम ।दमउपं) है और डिलीवरी का समय बेहद नजदीक होने के कारण स्थिति काफी नाजुक थी। डॉक्टरों ने तुरंत ए पॉजिटिव ब्लड की व्यवस्था करने को कहा। श्रीमती गुड़िया के पेट में जुड़वा बच्चे थे, जिससे खतरा दोगुना था। पति दुर्गेश अपनी पत्नी और
बच्चों की जान को खतरे में देख बेहद चिंतित और बेबस थे। परिवार के पास खून का कोई इंतजाम नहीं था और वे सिर्फ किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। जब पीड़ित परिवार को कोई रास्ता नहीं सूझा, तो उन्होंने बलखण्डी नाका निवासी समाजसेवी रत्नेश गुप्ता से फोन पर मदद की गुहार लगाई। मामले की गंभीरता को देखते हुए रत्नेश गुप्ता तुरंत सक्रिय हो गए। उन्होंने बिना वक्त गंवाए युवा शुभम धुरिया से संपर्क किया। शुभम ने स्थिति को समझते हुए सहर्ष रक्तदान करने की हामी भर दी और तुरंत अस्पताल पहुंचकर रक्तदान किया। ऐसे कठिन समय में शुभम धुरिया द्वारा किया गया यह रक्तदान सिर्फ खून का दान नहीं, बल्कि एक माँ की सांसों को सहारा और आने वाले जुड़वा बच्चों को जीवनदान था। रक्तदान केवल एक सामान्य दान नहीं है, बल्कि यह किसी की धड़कनों को बचाने का सबसे बड़ा मानव धर्म है। इस भीषण गर्मी और कठिन परिस्थितियों में हमारे छोटे से प्रयास से यदि किसी के घर की खुशियां टूटने से बच सकती हैं, तो इससे बड़ा पुण्य कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने समाज के अन्य युवाओं से भी अपील की कि वे नियमित रूप से रक्तदान के इस पुण्य कार्य में आगे आएं, क्योंकि एक रक्तदाता का एक छोटा सा प्रयास किसी जरूरतमंद की पूरी दुनिया बचा सकता है। जिंदगी बचाने की इस मुहिम को सफल बनाने में अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय नागरिकों ने भी पूरा सहयोग किया। इस नेक कार्य में गीता गुप्ता, नेतराम वर्मा, ब्लड बैंक की डॉक्टर अर्चना यादव, हरदेव, आशीष कुमार, पंकज जायसवाल और प्रमोद द्विवेदी का विशेष योगदान और सहयोग रहा, जिनकी तत्परता से समय रहते महिला को रक्त उपलब्ध हो सका।


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