लोहड़ी सिख/ पंजाबी समुदाय का प्रमुख त्यौहार है मुरव्यता पंजाब, दिल्ली, हरियाणा एवं पड़ोसी राज्यों में मनाया जाता है। लोहड़ी मकर सक्रान्ति के पहले आता है। लोहड़ी का त्योहार फसलों की कटाई पर प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है।किसानों के लिए यह समृद्धि, मेहनत के फल और कृतज्ञता का प्रतीक पर्व है। संध्या को लोग खुले स्थानों या घरों के सामने अलाव जलाते हैं लोहड़ी के लिये लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखकर उसको जलाकर समूह के साथ तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दाने की अग्नि की परिक्रमा करते हु्ए लोग अग्नि में अर्पित करते है है जिससे दुःखों कष्टों का नाश होता है। आग सेकते हुए रेवड़ी, खील, गजक, मक्का खाने का आनन्द लेते है। ढोल की ढाप पर गिद्दा एवं भागड़ा नृत्य एवं गायन इस अवसर पर करते है। इसका मान्यता है की जिस घर में नई बहू आती है और घर में संतान का जन्म हुआ होता है उस परिवार में बहुत धूम-धाम से लोहड़ी मनाते हैं सगे संबंधी एक-दूसरे को लोहड़ी की बधाई देते है नई बहु बच्चे को आशीर्वाद देते है
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Monday, January 12, 2026
लोहड़ी 13 जनवरी
लोहड़ी की लोक-कथा- एक समय सुन्दरी और मुदंरी नाम की दो अनाथ कन्याये थी जिनको उनके चाचा शादी न करके एक राजा को भेंट करना चाहता था। दुल्ला भट्टी गरीबों के मसीहा थे। वह अमीरों से धन छीनकर गरीबों में बांट दिया करते थे। उसने इन कन्याओं की मदद करी और लड़के वालों को मनाकर जंगल में आग जलाकर सुन्दरी और मुदंरी कन्याओं का विवाह करवाया। दुल्ला भट्टी ने शादी कराकर शगुन के तौर पर कन्याओं की झोली में शक्कर डालकर विदा किया। इस तरह एक दुल्ला भट्टी ने निर्धन कन्याओं के लिये पिता की भूमिका निभाई। कुछ लोगों के अनुसार लोहड़ी शब्द की उत्पत्ति संत कबीर की पत्नी लोई के नाम से हुई हैं तो कुछ लोग तिलोड़ी नाम से उत्पन्न हुआ मानते हैं जिसे बाद मे लोहड़ी कहा जाने लगा।
- ज्योतिषाचार्य एस0एस0 नागपाल , स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ

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