विकास बना विनाश का पर्याय?
प्रशासन की आंखें बंद या मौन स्वीकृति?
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । रामायण की पावन छाया में तप, त्याग व तितिक्षा का प्रतीक रहे चित्रकूट के पहाड़ आज खामोशी से अपना अंतिम संस्कार देख रहे हैं। जहां एक समय संतों की साधना गूंजती थी, वहीं अब जेसीबी की कर्कश आवाजें हवा में गूंज रही हैं। यह कोई सामान्य निर्माण कार्य नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता, एक आध्यात्मिक परंपरा, एक प्रकृति-आधारित संस्कृति के विनाश का मूक तमाशा है। बेडी पुलिया के पास कुछ तथाकथित सेवा संस्थाओं ने नियमों को ताक पर रखकर ऐसेे निर्माण कार्य किया है कि चित्रकूट की जमीन पर अब सिर्फ धार्मिकता नहीं, व्यावसायिकता बोई जा रही है- वह भी सीमेंट और सरिए के बीजों से। बीते कुछ वर्षों में पहाड़ियों की छाती चीरकर बन रही इमारतें केवल अवैध निर्माण नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संकेत हैं कि किस तरह सेवा के नाम पर भूमाफिया संस्कृति अब धर्म और आस्था की भूमि को निगल रही है। पाँच साल पहले जहाँ
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| बेडी पुलिया के पहाड जो लगातार कटान का शिकार हो रहे हैं |
केवल सीमित भूमि पर धार्मिक उद्देश्य से कार्य किए जाते थे, आज वहाँ दोगुनी-तिगुनी जमीन पर बहुमंजिला भवन और प्लॉटिंग का खेल खेला जा रहा है। सेवा के नाम पर चल रही ये गतिविधियाँ अब वाणिज्यिक विस्तार की भूख में बदल चुकी हैं। निर्माणकर्ताओं की यह भूख पहाड़ों को तोड़कर उनके गर्भ से धन निकालना चाहती है। प्रशासन की चुप्पी केवल संदेह नहीं जगाती, बल्कि उसे इस पूरे षड्यंत्र का मौन भागीदार भी बनाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह विकास नहीं, एक सुनियोजित और कागजी वैधता से ढका हुआ विनाश है। अब पहाड़ नहीं कट रहे, बल्कि चित्रकूट की आत्मा को चुपचाप जलाया जा रहा है। प्रशासन से कई बार स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इसपर संज्ञान लेने की अपील की, लेकिन हर बार उत्तर मिला- जांच कराई जाएगी। पर न तो जांच हुई, न ही कोई कार्रवाई, बल्कि अब तो तस्वीरें, वीडियो, और नक्शे खुद चीख-चीख कर कह रहे हैं कि कानून को पैरों तले कुचला जा रहा है। जिन संस्थानों को धार्मिक सेवा और समाज कल्याण का दायित्व निभाना चाहिए था, वे आज पर्यावरणीय विनाश व अवैध कब्जों के प्रतीक बनते जा रहे हैं।

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