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Friday, May 15, 2026

वट सावित्री व्रत 16 मई

ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। इस व्रत को बरगदाही व्रत भी कहते हैं महिलायें ये व्रत अखण्ड सौभाग्य के लिये करती है। इस व्रत में उपवास रखते है।  ये व्रत सावित्री द्वारा अपने पति को पुनः जीवित करने की स्मृति के रूप में रखा जाता है। वट वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है। इसकी जड़ों में ब्रह्नााजी, तने में विष्णु जी का और डालियों और पत्तियों मेें भगवान शिव का वास माना जाता है। वट वृक्ष की पूजा से दीर्घायु , अखण्ड सौभाग्य और उन्नति की प्राप्ति होती है। अमावस्या  तिथि 16  मई  को प्रात: 05:11  से प्रारम्भ हो 17 मई को देर रात्रि  01:30  पर समाप्त  होगी। उदयातिथि अनुसार 16 मई को वट वृक्ष पूजन करना श्रेष्ठ है  वट सावित्री व्रत के दिन काफी अच्छा संयोग बन रहा है। 16 मई की सुबह चंद्रमा मेष राशि में


संचार करेंगे, जहां वह मंगल ग्रह के साथ युति बनाएंगे. वहीं रात 10 बजकर 46 मिनट पर चंद्रमा मेष से निकलकर वृषभ राशि में संचार करेंगे, जहां सूर्य के साथ युति बनाएंगे. इस दिन सौभाग्य योग उपरान्त शोभन योग बनेगा,  मिथुन राशि में शुक्र और गुरु ग्रह की युति. ज्योतिष शास्त्र में गुरु को ज्ञान, धर्म और शुभता का कारक माना गया है, जबकि शुक्र सुख-संपत्ति, वैभव और भौतिक सुखों का प्रतिनिधित्व करता है. इन दोनों ग्रहों की युति को अत्यंत शुभ माना जाता है इस दिन शनि जयंती, शनि अमावस्या  हैं.

व्रत विधानः- इस दिन सुहागिन महिलाओं को सुबह स्नान करके नए वस्त्र और सोलह श्रंगार करना चाहिए। बरगद के पेड़ के नीचे माता सावित्री की पूजा करें।

पूजन सामग्री को बरगद  की जड़, दूध, हल्दी, कुमकुम, नारियल, भीगे हुए चने का भोगफल और ताजे फूल चढ़ाएं । इसके बाद वट वृक्ष को प्रसाद का भोग लगाएं और धूप-दीपक दिखाएं। इस के बाद हाथ जोड़कर माता सवित्री से पति की लंबी उम्र की कामना करें। वट वृक्ष के चारों ओर 7 बार परिक्रमा करते हुए कच्चे धागे या मोली को 7 बार लपेटें। अंत में बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर माता सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें।

-  ज्योतिषाचार्य एस. एस. नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र , अलीगंज , लखनऊ

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