बंदरों के अधिकारों पर क्यों सन्नाटा?
राम की तपोभूमि में बंदरों का संकट
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट में इन दिनों बंदरों को पकड़ने का अभियान तेजी से चल रहा है। वन विभाग इसे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने की कार्रवाई बता रहा है, लेकिन इस पूरे अभियान ने अब गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जिन बंदरों को पकड़कर जंगलों में छोड़ा जा रहा है, क्या वन विभाग के पास इसका कोई प्रमाण है कि वहां उनका जीवित रहना सुरक्षित है? क्या यह सुनिश्चित किया गया है कि उन्हें भोजन, पानी और उनके समूह जैसा प्राकृतिक वातावरण मिल सकेगा, या फिर सिर्फ शहर से हटाकर जंगल में छोड़ देना ही समाधान मान लिया गया है? बड़ा सवाल है कि इस अभियान की निगरानी आखिर कौन कर रहा है। क्या किसी पशु चिकित्सक, वन्यजीव विशेषज्ञ या पशु अधिकार कार्यकर्ता को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है? पकड़े गए बंदरों की मेडिकल जांच कौन कर रहा है? क्या उनके परिवहन के दौरान पशु क्रूरता निवारण अधिनियम
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| कैद में बंद पकडे हुए बंदर |
और वन्यजीव संरक्षण नियमों का पालन हो रहा है, या फिर पूरा अभियान केवल कागजों में कार्रवाई दिखाने तक सीमित है? स्थानीय लोगों और पशु प्रेमियों का कहना है कि मानव राहत जरूरी है, लेकिन बेजुबान वन्यजीवों के अधिकारों को कुचलकर नहीं। विशेषज्ञ मानते हैं कि बंदरों को उनके प्राकृतिक आवास और सामाजिक समूहों से अलग करना पारिस्थितिकी संतुलन के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है। इसके बावजूद वन विभाग सिर्फ पकड़ो और छोड़ो मॉडल पर चलता दिखाई दे रहा है। सवाल यह भी है कि क्या यह अभियान वास्तव में समाधान है या फिर सिर्फ प्रशासनिक खानापूर्ति? राम और हनुमान की आस्था से जुड़ी इस धरती पर अब बंदरों की सुरक्षा से ज्यादा फाइलों की औपचारिकता भारी पड़ती नजर आ रही है।
बंदरों को पकड़ने के क्या हैं कानूनी नियम? भारत में बंदरों को पकड़ने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 और प्रीवेन्शन आफॅ क्रूयल्टी टू एनिमल्स एक्ट 1960 के तहत वन विभाग मनमाने तरीके से बंदरों को नहीं पकड़ सकता। नियमों के अनुसार पकड़ने के दौरान जानवर को कम से कम पीड़ा पहुंचनी चाहिए। मेडिकल जांच, भोजन-पानी, सुरक्षित और हवादार पिंजरे, तथा सुरक्षित परिवहन अनिवार्य हैं। गर्भवती या छोटे बच्चों वाले बंदरों के परिवहन पर विशेष सावधानी जरूरी है। वन विभाग को किसी भी विस्थापन से पहले रिलीज साइट (जहाँ बंदर छोड़े जाने हैं) का निरीक्षण करना होता है कि क्या वह क्षेत्र इतने नए बंदरों का बोझ उठा पाएगा। और अगर वन विभाग ने निरीक्षण किया है तो कितने बंदर छोडे जा सकते है? विशेषज्ञों के अनुसार बंदरों को उनके सामाजिक समूहों से अलग करना और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के दूसरे क्षेत्रों में छोड़ना पारिस्थितिकी संतुलन के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे में हर अभियान में नियमों के पालन और निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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