धरने के 13वें दिन भीषण तपिश के बीच मनाई विभाग की ‘तेरहवीं’
बांदा, के एस दुबे । चकबंदी विभाग की कार्यप्रणाली और कथित भ्रष्टाचार से त्रस्त अन्नदाताओं का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया है। शहर के अशोक लाट के समीप चल रहे किसानों के अनिश्चितकालीन धरने के 13वें दिन, आंदोलनकारियों ने विरोध का एक बेहद अनोखा और कड़ा तरीका अपनाया। झुलसाने वाली भीषण गर्मी और तपिश के बीच किसानों ने चकबंदी विभाग की प्रतीकात्मक श्तेरहवींश् मनाई और राहगीरों को शरबत बांटकर अपना आक्रोश दर्ज कराया। किसानों ने दो टूक चेतावनी दी है कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता और विभाग से भ्रष्टाचार का कचरा साफ नहीं होता, वे कदम पीछे नहीं हटाएंगे।
प्रदर्शन कर रहे किसानों का आरोप है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश में चौथे स्थान पर काबिज बांदा चकबंदी विभाग, पहले पायदान पर पहुंचने की अंधी होड़ में लगा हुआ है। इस रैट-रेस के चक्कर में विभाग नियमों को ताक पर रखकर मनमानी कर रहा है। जिले के सिलेहटा, लोहरा, अमलीकोर, बहीँगा, खपटिहा खुर्द और महावरा जैसे कई गांवों के किसान इस लचर प्रक्रिया के कारण बुरी तरह प्रताड़ित हो रहे हैं। आरोप है कि विभाग किसानों की जायज आपत्तियों का सही ढंग से निस्तारण किए बिना ही, आनन-फानन में कागजों पर श्धारा 52श् (चकबंदी पूर्ण होने की घोषणा) लागू करने की जुगत में भिड़ा है। धरने पर बैठे किसानों के पास मौजूद दस्तावेज विभाग की कार्यशैली की पोल खोलने के लिए काफी हैं। हैरानी की बात यह है कि धरने पर बैठे अधिकांश पीड़ित किसान तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इस क्षेत्र के स्थानीय विधायक उत्तर प्रदेश सरकार में भारी-भरकम राज्यमंत्री के पद पर सुशोभित हैं। इसके बावजूद, पिछले 13 दिनों से अन्नदाता इस जानलेवा गर्मी में खुले आसमान के नीचे सड़क पर बैठने को मजबूर हैं, लेकिन शासन-प्रशासन का कोई भी आला अधिकारी अब तक उनकी सुध लेने धरना स्थल पर नहीं पहुंचा है। भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के मंडलाध्यक्ष बलराम तिवारी श्बुंदेलखंड किसान केसरीश् तथा सदर तहसील अध्यक्ष रोहित द्विवेदी ने एक संयुक्त बयान जारी कर शासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि 13 दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से धरने पर बैठे किसानों की मांगों की लगातार अनदेखी करना जिला प्रशासन की घोर असंवेदनशीलता और तानाशाही को दर्शाता है। एक तरफ सूबे की सरकार की प्राथमिकता में किसान हित सबसे ऊपर होने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ बांदा का प्रशासन किसानों की आवाज को दबाने में लगा हुआ है।

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