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Thursday, June 25, 2026

यौमे आशूरा: सब्र, कुर्बानी और हक की बुलंदी का पैगाम

मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही ने बताई यौमे आशूरा की हकीकत 

फतेहपुर, मो शमशाद । इस्लामी साल के पहले महीना मुहर्रम का दसवाँ दिन, यानी यौमे आशूरा, इतिहास-ए-इस्लाम का वह अज़ीम और रूहानी दिन है जो इंसानियत को सब्र, इस्तिक़ामत, कुर्बानी और हक़ पर डटे रहने का सबक देता है। यह दिन सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि ईमान, वफ़ादारी और अल्लाह की रज़ा के लिए हर कुर्बानी पेश करने के जज़्बे की याद दिलाता है। यह बातें हुज़ूर असहाबे मिल्लत के नवासे हजरत मौलाना आमिर मियां सफ़वी मिस्बाही ने अपने एक बयान में बताया।

मौलाना आमिर मियां सफवी।

यौमे आशूरा की सबसे बड़ी अहमियत कर्बला के उस दर्दनाक लेकिन रोशन वाक़िये से जुड़ी है, जब नबी-ए-करीम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने अहले-बैत और जाँनिसार साथियों के साथ हक़ और इंसाफ़ की हिफाज़त के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दीं। कर्बला का मैदान हमें यह पैग़ाम देता है कि ज़ुल्म चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो, हक़ और सच्चाई की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने यज़ीदी ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने झुकने के बजाय शहादत को कबूल किया, ताकि दीन-ए-इस्लाम की अस्ल रूह महफ़ूज़ रहे। उनकी यह अज़ीम कुर्बानी क़यामत तक आने वाली नस्लों के लिए मशअले-राह बनी रहेगी। यौमे आशूरा हमें यह भी याद दिलाता है कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों की कैसे मदद फ़रमाता है। इसी दिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इस्राईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म से निजात मिली थी। इसलिए यह दिन शुक्र, इबादत और अल्लाह की नेमतों को याद करने का भी दिन है। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम कर्बला के पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में उतारें। सच बोलें, इंसाफ़ का साथ दें, मज़लूमों की मदद करें, आपसी इत्तेहाद और भाईचारे को मज़बूत करें और हर तरह की बुराइयों से बचें। इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़िंदगी हमें बताती है कि एक मोमिन कभी भी हक़ और सच्चाई के रास्ते से पीछे नहीं हटता। आइए, यौमे आशूरा के मौके पर हम सब यह अहद करें कि हम अपने किरदार, अमल और अख़लाक़ को इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ संवारेंगे और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु तथा शोहदाए कर्बला की कुर्बानियों को याद रखते हुए हक़, इंसाफ़ और इंसानियत की राह पर चलेंगे। उन्होंने दुआ किया कि अल्लाह तआला हमें यौमे आशूरा के फ़ज़ाइल से फ़ैज़याब फ़रमाए और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की सीरत से सबक लेकर अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।


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