लोहे की जगह लकड़ी पर डाला गया लेंटर
चित्रकूट में विकास की पोल
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । जिले की मऊ तहसील के जमोहरा गांव स्थित परदवां-बरियारी मार्ग पर ढाई करोड़ रुपये की लागत से बन रहा पुल मात्र 24 घंटे में ही ढह गया। यह घटना मंगलवार की रात उस वक्त सामने आई जब ग्रामीणों ने देखा कि पुल के दो पिलरों के बीच डाली गई लेंटर भरभराकर गिर चुकी है। निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठते ही ग्रामीणों ने लोक निर्माण विभाग ( पीडब्लूडी) पर लापरवाही का आरोप लगाया। जब पीडब्लूडी के जेई मौके पर पहुंचे तो जांच का हवाला देकर बात टालने लगे। डीएम चित्रकूट ने बयान जारी करते हुए बताया कि घटना में कोई जनहानि नहीं हुई है और प्रथम दृष्टया ठेकेदार दलवीर सिंह द्वारा लोहे के बजाय लकड़ी की शटरिंग प्रयोग करने के चलते हादसा हुआ है। विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं। घटना के बाद समाजवादी पार्टी के मीडिया सेल ने भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि भाजपा शासन में कथित विकास कार्य महज भ्रष्टाचार की इमारत बनकर रह गए हैं। 24 घंटे में पुल गिरने की घटना को भ्रष्टाचार का खुला
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| लेंटर गिरने से ढहा ढाई करोड़ की लागत से बना पुल |
प्रमाण बताया गया। बयान में तंज कसते हुए कहा गया कि जब सीमेंट भाजपा नेताओं की जेब में चला जाएगा तो पुलों में रेत ही लगेगी, और रेत का पुल गिरने में देर नहीं लगती। स्थानीय लोगों ने भी बताया कि यह कोई तकनीकी भूल नहीं बल्कि पीडब्लूडी और ठेकेदार की मिलीभगत से हुआ एक सुनियोजित खेल है, जिसमें जनता की मेहनत की कमाई को लूटने का काम किया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि पुल निर्माण में घटिया सामग्री का प्रयोग किया गया और अधिकारियों की निगरानी पूरी तरह लापरवाही भरी थी। इस घटना ने योगी सरकार के गुणवत्ता आधारित निर्माण के दावे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल है कि जब ठेकेदार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो और अधिकारी आंखें मूंद लें, तो जनता का भरोसा कहां जाएगा? चित्रकूट का यह पुल अब सिर्फ एक टूटी हुई संरचना नहीं बल्कि भ्रष्टाचार, लापरवाही और सत्ता संरक्षण की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। पीडब्लूडी जांच टीम की गहरी साजिश व भ्रष्टाचार का हिस्सा? जब ढाई करोड़ की लागत से परदवां-बरियारी मार्ग पर विशाल पुल का निर्माण हो रहा था, तो आखिर पीडब्लूडी की जांच टीम क्या कर रही थी? क्या विभाग में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की नियमित जांच का कोई प्रावधान नहीं है, या फिर यह सिर्फ कागजों तक ही सीमित है? जिस अधिकारी की जिम्मेदारी थी कि वह समय-समय पर निर्माण की निगरानी करे, उसकी भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रथम दृष्टया स्पष्ट हो चुका है कि लोहे की जगह लकड़ी से सहारा देकर स्लैब डाली गई, जिससे लेंटर भरभराकर गिर गया- तो ऐसे में संबंधित ठेकेदार और निगरानी अधिकारी की अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? यह हादसा महज एक तकनीकी भूल नहीं, बल्कि एक गहरे भ्रष्टाचार और लापरवाही की उपज है।


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