अकीदतमंदों की नम नजर आईं आंखें
मातमी धुन के साथ निकाले गए ताजिए
बदौसा, के एस दुबे । मैदान-ए-कर्बला में इंसानियत की रक्षा करते हुए शहीद हुए मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 71 अनुयायियों की याद में उनके 40वें पर चाहने वालों की आंखें नम नज़र आयीं। चेहल्लुम पर कस्बे में ताज़िए के साथ मातमी धुन पर ढ़ोल बजाकर जुलूस निकाला गया। इस दौरान तमाम चौकों (इमामबाड़ों) पर मजलिस हुई व कई जगहों पर लोगों ने लंगर के इंतज़ाम किए। शुक्रवार को कस्बे में चेहल्लुम पर हज़रत इमाम हुसैन की याद में मातमी धुन पर जुलूस निकाला गया और यजीद के ज़ुल्मो के खिलाफ़ लड़ते हुए शहीद हुए इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों को याद किया गया। चेहल्लुम पर उनकी शहादत को याद कर सारा माहौल गमगीन हो गया। ताजिया जुलूस मध्यरात्रि को उठा और दुबरिया स्थित अलग-अलग मोहल्लों से होता हुआ इमामबाड़ों में रख दिया गया। इसके बाद दोपहर बाद अपने-अपने इमामबाड़ों से उठकर नदी रोड स्थित पुरानी बाजार मैदान में पहुंचा, जहां मेले के रूप में परिवर्तित हो गया। इसके बाद रात्रि 9 बजे नदी के पार बगीचा पुरवा को बढ़ गया, वहां शनिवार को कर्बला में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया जाएगा। जुलूस के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था के लिए थाना प्रभारी विजय कुमार कुशवाहा, उपनिरीक्षक गुलाब चंद्र यादव, केके मिश्रा व पुलिस बल के साथ मुस्तैद रहे।

चेहल्लुम पर ताजिया जुलूस निकालते अकीदतमंद
क्यों मनाते हैं चेहल्लुम
बदौसा। मुस्लिम धर्मावलंबियों के अनुसार कर्बला के शहीदों की शहादत को याद करने के लिए चेहल्लुम मनाया जाता है। चेहल्लुम मुहर्रम के 40वें दिन पर मनाया जाता है। कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन मानवता की रक्षा करते हुए अपने परिवार व साथियों के साथ जंग के मैदान में शहीद हो गए थे। उनके साथ मात्र 72 हकपरस्त यानी वफादार लोगों का समूह था, वहीं दूसरी ओर यजीद की 22 हजार से भी अधिक हथियार बंद सेना थी। कर्बला जंग समय के हिसाब से तो छोटी जंग थी, लेकिन इस्लाम के इतिहास में लड़ाई सत्य और असत्य या कहें कि न्याय और अन्याय के बीच थी। जिसमें गिनती के चंद लोगों के साथ इमान और इंसाफ़ के लिए लड़ते हुए शहादत दी।

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