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Sunday, May 10, 2026

सिद्ध पीठ मां कालका मंदिर दूरेड़ी में होगा, विशाल भंडारा का आयोजन

बांदा, के एस दुबे । श्रीमद्भागवत कथा का हुआ समापन कथा वाचक लखनलाल दीक्षित ने बताया कि दोस्ती सीखनी है तो सुदामा और भगवान से सीखने लायक है 7 दिन की यह कथा सुनने सभी क्षेत्र के लोग बड़े हर्ष उल्लास से प्रतिदिन कथा सुनने आते रहे तथा कथा वाचक ने कहा कि कुछ  जनता जो कथा सुनने आती रही भगवान के कुछ अच्छे कार्यों  को अपने जीवन में उतार लेंगे तो ग्रस्तआश्रम आसान हो जाएगा  श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की अनेक प्रेरणादायक कथाएँ वर्णित हैं। इनमें सुदामा जैसी सच्ची मित्रता और कंस वध का प्रसंग विशेष महत्व रखता है।


श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र थे। दोनों ने गुरु संदीपन मुनि के आश्रम में साथ शिक्षा प्राप्त की। समय के साथ श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गएए जबकि सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण के रूप में जीवन बिताने लगे। गरीबी के बावजूद सुदामा ने कभी अपने मित्र से सहायता नहीं माँगी। पत्नी के आग्रह पर वे श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे और उपहार स्वरूप थोड़ा सा चिवड़ा लेकर गए। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र को देखकर प्रेमपूर्वक गले लगायाए उनके चरण धोए और बड़े आदर से उनका स्वागत किया। भगवान ने सुदामा के साधारण उपहार को भी प्रेम से स्वीकार किया। जब सुदामा वापस लौटेए तो उनकी झोपड़ी महल में बदल चुकी थी। यह प्रसंग सच्ची दोस्तीए प्रेम और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है।

दूसरी ओरए कंस अत्याचारी राजा था। आकाशवाणी हुई थी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। भय के कारण कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआए तब वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ छोड़ आए। बड़े होकर श्रीकृष्ण ने अनेक राक्षसों का संहार किया। अंततः वे मथुरा पहुँचे और कंस के विशाल अखाड़े में उससे युद्ध किया। भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर अत्याचार का अंत किया और धर्म की स्थापना की।

यह कथा हमें सच्ची मित्रताए भक्तिए साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देती है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की अनेक प्रेरणादायक कथाएँ वर्णित हैं। इनमें सुदामा जैसी सच्ची मित्रता और कंस वध का प्रसंग विशेष महत्व रखता है।

श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र थे। दोनों ने गुरु संदीपन मुनि के आश्रम में साथ शिक्षा प्राप्त की। समय के साथ श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गएए जबकि सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण के रूप में जीवन बिताने लगे। गरीबी के बावजूद सुदामा ने कभी अपने मित्र से सहायता नहीं माँगी। पत्नी के आग्रह पर वे श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे और उपहार स्वरूप थोड़ा सा चिवड़ा लेकर गए। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र को देखकर प्रेमपूर्वक गले लगाया, उनके चरण धोए और बड़े आदर से उनका स्वागत किया। भगवान ने सुदामा के साधारण उपहार को भी प्रेम से स्वीकार किया। जब सुदामा वापस लौटे, तो उनकी झोपड़ी महल में बदल चुकी थी। यह प्रसंग सच्ची दोस्ती, प्रेम और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है।

दूसरी ओरए कंस अत्याचारी राजा था। आकाशवाणी हुई थी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। भय के कारण कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआए तब वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ छोड़ आए। बड़े होकर श्रीकृष्ण ने अनेक राक्षसों का संहार किया। अंततः वे मथुरा पहुँचे और कंस के विशाल अखाड़े में उससे युद्ध किया। भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर अत्याचार का अंत किया और धर्म की स्थापना की। यह कथा हमें सच्ची मित्रताए भक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देती है।


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