मंदिर में झुकाया गया सिर श्रद्धा का प्रतीक, माता-पिता के प्रति व्यवहार दर्शाता है संस्कार
बांदा, के एस दुबे । नवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा, आस्था और भक्ति का प्रतीक है। इन नौ दिनों में श्रद्धालु माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। मंदिरों में पूजा-पाठ, व्रत और धार्मिक आयोजनों के बीच यह विचार भी महत्वपूर्ण है कि क्या हमारी भक्ति तभी पूर्ण होती है, जब हम माँ दुर्गा की आराधना के साथ अपनी जन्मदात्री माँ और माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करें? जिस माँ ने नौ महीने अपनी कोख में रखकर हमें जन्म दिया, अपनी गोद में खिलाया, हमारी परवरिश की और हमारी खुशियों के लिए अपने सुखों का त्याग किया, क्या हम उसकी खुशियों और जरूरतों का पर्याप्त ध्यान रखते हैं? यह सवाल हर व्यक्ति को आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है।
हम माँ दुर्गा के दरबार में चुनरी चढ़ाते हैं, भोग लगाते हैं और दीप जलाकर परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। लेकिन क्या हम अपनी माँ के पास बैठकर उसका हालचाल पूछते हैं? क्या हम उसकी जरूरतों को समझते हैं और उसे पर्याप्त समय, प्रेम तथा सम्मान देते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है। आज समाज में ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं, जहां कुछ बुजुर्ग माता-पिता अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते हैं। जिन बच्चों की परवरिश में माता-पिता अपना पूरा जीवन लगा देते हैं, कभी-कभी वृद्धावस्था में उन्हीं माता-पिता को भावनात्मक सहारे और अपनेपन की आवश्यकता होती है। हालांकि, प्रत्येक परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं और वृद्धाश्रम में रहना अपने आप में उपेक्षा का प्रमाण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि माता-पिता को उनकी परिस्थितियों के अनुरूप सम्मान, देखभाल और अपनापन मिले। बांदा जनपद के जौहरपुर गांव निवासी अखिलेश प्रधान सिंह, CISF, मुंबई का मानना है कि ईश्वर की सच्ची आराधना का एक महत्वपूर्ण स्वरूप अपने माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान, सेवा और संवेदनशीलता भी है। धार्मिक आस्था और पारिवारिक कर्तव्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
नवरात्रि का पर्व हमें शक्ति, करुणा, सदाचार और नारी सम्मान का संदेश देता है। माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करने के साथ हमें अपने दैनिक जीवन में भी महिलाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का भाव अपनाना चाहिए। विशेष रूप से अपनी जन्मदात्री माँ की भावनाओं, आवश्यकताओं और सम्मान का ध्यान रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। आइए, इस नवरात्रि हम संकल्प लें कि पूजा-पाठ और व्रत के साथ अपने माता-पिता को समय देंगे, उनकी बात सुनेंगे, उनकी जरूरतों का ध्यान रखेंगे और उन्हें यह एहसास कराएंगे कि वे हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि मंदिर में माँ के सामने झुकाया गया सिर हमारी श्रद्धा को दर्शाता है, जबकि अपने माता-पिता के प्रति हमारा व्यवहार हमारे संस्कारों को प्रकट करता है। इस नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना के साथ माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और कर्तव्य निभाने का संकल्प लें। यही हमारी आस्था को व्यवहार से जोड़ने और भारतीय संस्कारों को जीवित रखने की दिशा में सार्थक कदम होगा।


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