विधायक बोले- भांजे की ट्रैक्टर छोड़ दो -- एआरटीओ बोले- 70600 का चालान भर दो
एआरटीओ के न झुकने से तिलमिलाया विधायक?
सियासी साजिश या सच का साहस?
शुरू हुई बदनाम करने की साजिश?
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । जब ईमानदारी सत्ता से टकराती है, तो जमीन पर जंग और फिजाओं में अफवाहें तैरने लगती हैं। कुछ ऐसा ही नजारा चित्रकूट में तब दिखा, जब एआरटीओ विवेक शुक्ला ने विधायक अनिल प्रधान की फोन पर की गई सिफारिश मानने से इनकार कर दिया। विधायक जी ने जिस ट्रैक्टर को भांजे की देख-रेख में बताया, उस पर अवैध खनन का आरोप था, और उस पर 70600 रुपये का चालान ठोंका गया। विधायक साहब चाह रहे थे कि गाड़ी छोड़ दीजिए..., मगर एआरटीओ ने चालान करके जवाब दिया- कानून सबके लिए बराबर है, चालान भरिए। और बस। यहीं से शुरु हो गई शिकायती राजनीति की पटकथा। विधायक अनिल प्रधान ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक लंबा चौड़ा शिकायती पत्र भेज डाला, जिसमें एआरटीओ पर भ्रष्टाचार, दलालों की फौज, अवैध उगाही, डमी गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन और न जाने क्या-क्या आरोप मढ़ दिए। आरोपों की फेहरिस्त इतनी लंबी कि मानो पूरा विभाग ही पाप का पिंड हो। मगर सवाल है- क्या यह वाकई भ्रष्टाचार का मामला है या फिर
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| एआरटीओ की चालान की प्रति जिसमें प्रेम सिंह के नाम 13 मई को चालान किया गया। |
ईमानदारी की कीमत चुकता करने की एक चालाक सियासी कोशिश? एआरटीओ ने जवाब में कॉल रिकॉर्डिंग और दस्तावेजी प्रमाण पेश कर दिए, जिसमें स्पष्ट रूप से विधायक द्वारा ट्रैक्टर छोड़ने की सिफारिश करते हुए सुना जा सकता है। कहा कि विधायक जी ने जिस ट्रैक्टर के लिए फोन किया, वो अवैध खनन करते हुए बहिलपुरवा क्षेत्र में पकड़ा गया था। ट्रैक्टर पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी और कागजात अधूरे थे। ट्रैक्टर का मालिक चालान में प्रेम सिंह नामित है, लेकिन विधायक जी ने फोन पर कहा कि यह मेरे भांजे राहुल की देखरेख में है। विवेक शुक्ला ने झुके बिना नियमों को लागू किया, और ट्रैक्टर को नहीं छोड़ा। अब जब बात न बनी, तो शुरू हो गई साजिशों की सियासत। एक सख्त और नियमों के प्रति कटिबद्ध अधिकारी को बदनाम करने की कोशिशें शुरू हो गईं। आरोप लगे कि कार्यालय में दलाल सक्रिय हैं, एआरटीओ कार्यालय में नहीं बैठते, हर फाइल दलालों के जरिये पास होती है- पर जब विधायक जी से इन आरोपों के संबंध में फोन कर सबूत मांगे गए, तो जवाब मिला- जो पत्र में लिखा है, वही लिख दो। अगर एआरटीओ गलत हैं तो जांच हो, लेकिन अगर विधायक की सिफारिश को न मानना ही भ्रष्टाचार है, तो फिर ईमानदारी की परिभाषा दोबारा लिखनी होगी।
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