बाँदा, के एस दुबे । माहे मुहर्रम की सातवीं तारीख पर आज मंगलवार को शाम 4 बजे से पूर्वी कोठी इमामबारगाह से अलम का मातमी कदीमी जुलूस निकाला गया। जिसमें अकीदतमंदों ने शिरकत करते हुये इमाम हुसैन को मातम करते हुये पुरसा पेश किया। आज दोपहर 2 बजे पूर्वी कोठी, डिग्गी चौराहा इमामबारगाह में मजलिस का आयोजन हुआ। जिसमें गाजीपुर से तशरीफ लाये हुये मौलाना सैयद हैदर करबलाई ने मिम्बर से खिताब फरमाया और फजायले इमाम हुसैन बयान किये और बताया कि "आज सातवी मुहर्रम से करबला के रेगिस्तान में इमाम हुसैन के साथ उनके साथियों और यहाँ तक कि छोटे छोटे बच्चों पर यज़ीदी फौज द्वारा पानी बंद कर दिया गया और नहरे फुरात पर पहरा लगा दिया गया इसके बावजूद भी रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन सब्र करते रहे और हक, इंसाफ और इंसानियत को बचाने के लिये सत्य के पथ पर अडिग रहे और तीन दिन तक भूखे प्यासे रहकर भी
हक और इंसानियत का रास्ता न छोड़ा। अंत में दसवीं मुहर्रम को अपने साथियों के साथ करबला के मैदान में शहादत पेश कर दी। उन्होंने बताया कि "इमाम हुसैन ने करबला के मैदान में ये दुनिया को ये बता दिया कि चाहे सर भी कलम हो जाये लेकिन कभी हक, इंसाफ और इंसानियत का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिये।" मजलिस में आये अकीदतमंदों की आंखे शहादतों का बयान सुनकर नम हो गयी। मजलिस के बाद अलमों का कदीमी जुलूस बरामद हुआ। जिसमें रज़ा मेंहदी, हसन अख्तर, अली ज़हीर, शजरुल हसन, हसन रजा एडवोकेट ने कदीमी मरसिया पेश किया। "जब कट गये दरिया पे अलमदार के बाजू, रेती पे गिरे शाह के गमख्वार के बाजू।" जिसे सुनकर अकीदतमंदो की आँखें नम हो गयी और माहौल गमगीन हो गया। इसके बाद अलम का जुलूस पूर्वी कोठी इमामबारगाह से रोड पर आया और अंजुमन अब्बासिया के साहिबे बयाज शमसुल हसन रिजवी ने नौहा पेश किया "करबला के बहत्तरों को सलाम, जो थे नेजों पे उन सरों को सलाम" जिस पर अंजुमन के मातमदारों ने सीनाजनी शुरू की और जुलसू प्रारम्भ हुआ। यह जुलूस पदमाकर चौराहा, जीजीआईसी, बाकरगंज चौराहा होते हुये छावनी चौराहा पर पहुँचा, जहाँ झाँसी से आये हुये मौलाना फरमान अली आब्दी साहब ने तकरीर खिताब फरमायी और इमाम हुसैन का हक, इंसाफ, इंसानियत, अमन, चैन और एकता का संदेश हजारों की संख्या में मौजूद अकीदतमंदों तक पहुँचाया। उन्होंने ये भी बताया कि "खुद इमाम हुसैन को हिंदुस्तान से बेहद प्यार था। जब उन पर यज़ीदी हुकूमत के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे तब उन्होंने हिंदुस्तान जाने की इच्छा भी जाहिर की थी। लेकिन ऐसा हो न सका और इमाम हुसैन को अपने भरे घर के साथ मदीना छोड़कर करबला के लिये रवाना होना पड़ा। जहाँ उनको यज़ीदी फौज द्वारा घेरकर दसवीं मोहर्रम को शहीद कर दिया गया।" तकरीर के बाद यह मातमी जुलूस गूलरनाका, अमर टाकीज चौराहा, जामा मस्जिद, गोल कोठी से होकर इमामबारगाह, अनवरी बेगम कम्पाउंड, अलीगंज तक पहुँचा। वहा पहुँचकर मगरिब की नमाज़ के तुरंत बाद एक मजलिस का आयोजन हुआ जिसे मौलाना फरमान अली आब्दी झाँसी ने खिताब फरमाया। पुनः यह जुलूस इमामबारगाह अलीगंज से उठाया गया और गोल कोठी, जिला परिषद चौराहा, महिला डिग्री कालेज, नगरपालिका परिषद, फूलमाला तिराहा, चौक बाजार, सब्जी मण्डी, छावनी चौराहा, बाकरगंज चौराहा, पदमाकर चौराहा होते हुये पूर्वी कोठी, डिग्गी चौराहा स्थित इमामबारगाह पर आकर समाप्त हुआ। जिसके बाद इमामबारगाह अली इमाम आब्दी साहब में अकीदतमंदों और मातमदारों के लिये नजरे हजरत अब्बास का आयोजन किया गया। इस मौके पर जिला प्रशासन द्वारा भारी पुलिस बल जुलूस के साथ तैनात रहा। शोएब रिजवी ने समस्त पुलिस प्रशासन का उनके सहयोग के लिये धन्यवाद किया। अलम के इस कदीमी जुलूस में अली इमाम आब्दी, मिर्जा यावर हुसैन एडवोकेट, अली अकबर, आगा अन्सार, मजहर हुसैन, अन्सार हुसैन, रजा मेंहदी, मोहम्मद रजा, शोएब रिजवी, जफर रजा, शजरुल हसन, असगर रजा, अली हैदर, वसीम हैदर, शमीम हैदर, साजिद हुसैन, अहमद रजा, हैदर शिकोह एडवोकेट, हसन रजा एडवोकेट, कायम रजा, मोहसिन रजा एडवोकेट, अली मंजर एडवोकेट, अरशद मेंहदी, खुर्रम शिकोह, दानिश रिजवी, बदरे आलम, तौकीर इमाम, नसीम हैदर एडवोकेट एवं सैकड़ों की तादाद में अकीदतमंद उपस्थित रहे।


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