राजस्व व रॉयल्टी का उलझा हिसाब?
जिम्मेदार लगे खानापूर्ति में
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । जिले की पहाड़ियों में खनन का यह मामला अब महज 132 घनमीटर अवैध खुदाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे छिपे संभावित बड़े आर्थिक खेल पर सवाल उठने लगे हैं। जांच में 132 घनमीटर अवैध खनन पकड़ा गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यह मात्रा वास्तविक खनन की तुलना में बहुत छोटी हो सकती है। सूत्रों और लगाए जा रहे आरोपों के अनुसार क्षेत्र में एक वर्ष के भीतर लगभग 50 करोड़ रुपये तक का खनन होने की बात कही जा रही है, जबकि सरकारी अभिलेखों में जमा रॉयल्टी करीब 2 करोड़ 35 लाख रुपये ही बताई जा रही है। यदि यह अंतर सही है तो सवाल लाजिमी है कि शेष खनिज कहां गया और सरकार को वास्तव में कितना राजस्व नुकसान हुआ। इतना ही नहीं, यह भी बड़ा प्रश्न है कि अवैध रूप से निकाला गया पत्थर आखिर किस मार्ग से और किन माध्यमों के जरिए बाजार तक पहुंचा। क्या उसके परिवहन के लिए वैध रॉयल्टी स्लिप या ई-रवन्ना जारी हुआ था, या फिर खनिज बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज के ही बाहर भेज दिया
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| खनन साइट जहां प्रशासन ने खनन बंद होने की रिपोर्ट लगाई है |
गया। इस पूरे प्रकरण में एक और सवाल लगातार उठ रहा है कि जब सरकार ने अवैध खनन की निगरानी के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर हाईटेक सीसीटीवी कैमरे लगाए हैं, तो शिकायतों के बावजूद उनमें खनन गतिविधियों का कोई ठोस रिकॉर्ड क्यों सामने नहीं आ रहा। क्या कैमरों की निगरानी व्यवस्था निष्क्रिय है या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था की परतों में ही सच्चाई दब गई है। क्षेत्र में यह आरोप भी चर्चा में हैं कि वास्तविक खनन और जमा रॉयल्टी के बीच भारी अंतर है तथा सरकारी अवैध वसूली की भी बातें सामने आ रही हैं, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। लेकिन इतना तय है कि चित्रकूट की पहाड़ियों में उठती यह धूल अब केवल पत्थरों की नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही के सवालों की भी है।
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