प्रशासन पर बिना मुक्ति प्रमाण पत्र घर भेजने का आरोप
बांदा/बबेरू, के एस दुबे । संगठित मजदूर मोर्चा और लेबर डेवलपमेंट फाउंडेशन के कड़े प्रयासों के बाद बांदा जिले के 18 बाल एवं बंधुआ मजदूरों को राजस्थान और हरियाणा के ईंट भट्ठों से सकुशल मुक्त करा लिया गया है। मुक्त कराए गए सभी मजदूर अनुसूचित जाति समुदाय के हैं, जिन्हें पिछले कई महीनों से बंधक बनाकर रखा गया था। 14 जून को सभी मजदूर अपने गृह जनपद बांदा के बबेरू पहुंच गए हैं, लेकिन प्रशासन द्वारा नियमानुसार मुक्ति प्रमाण पत्र न दिए जाने पर मजदूर संगठनों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मोर्चा से मिली जानकारी के अनुसार, इन मजदूरों को दो अलग-अलग राज्यों के भट्ठों से आजाद कराया गया है श्रीगंगानगर जिले की रावला मंडी स्थित श्गणेश ब्रिक्स कंपनीश् से 6 मजदूर मुक्त कराए गए। रेवाड़ी जिले के जाडरा गांव स्थित श्भगत जी ईंट भट्ठाश् से 3 परिवारों के 12 लोगों को आजाद कराया गया।
राजस्थान से मुक्त हुए मजदूर नीरज ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि नवंबर 2025 में ठेकेदार पहलवान उर्फ प्रदीप उन्हें कर्ज और एडवांस का लालच देकर ट्रक से श्रीगंगानगर ले गया था। वहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं। जब मजदूरों ने इसका विरोध किया, तो भट्ठा मालिक सुखबीर और ठेकेदार ने लाखों का फर्जी कर्ज बताकर उन्हें धमकाया। घर वापस लौटने की बात करने पर मारपीट, गाली-गलौज और बच्चों समेत भट्ठे में झोंककर जलाने की धमकियां दी जाती थीं।इसी तरह हरियाणा में फंसे रमेश और अन्य परिवारों को भी जमादार दिलीप नवंबर 2025 में एडवांस देकर ले गया था। मजदूरों का आरोप है कि कर्ज चुकाने के बाद भी उन्हें मजदूरी नहीं दी गई और जबरन बिना पैसों के काम कराया जा रहा था।
मामले की भनक 4-5 जून 2026 को असंगठित मजदूर मोर्चा को लगी, जिसके बाद मोर्चा ने तुरंत पीड़ित परिवारों से संपर्क साधा। 8 जून को मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दल सिंगार ने राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, श्रम आयुक्त, तीनों जिलों के डीएम-एसपी और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र भेजकर बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम 1976, इंटरस्टेट माइग्रेंट वर्कमैन एक्ट 1979, एससी-एसटी एक्ट और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की मांग की। 10-11 जून को स्मरण पत्र भेजने और लगातार अधिकारियों से पैरवी के बाद 12 जून को संयुक्त टीम गठित कर सभी 18 मजदूरों को मुक्त कराया गया।मजदूरों की सुरक्षित वापसी तो हो गई है, लेकिन मजदूर संगठनों ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कड़ा रोष जताया है। असंगठित मजदूर मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दल सिंगार ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने बंधुआ मजदूरी कानून का ठीक से पालन नहीं किया। मजदूरों को बिना सुरक्षा और बिना मुक्ति प्रमाण पत्र के ही घर भेज दिया गया। बुंदेलखंड के मजदूरों की स्थिति बेहद दयनीय है, लेकिन प्रशासन स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए गंभीर नहीं है। जब बड़े उद्योगपतियों और किसानों का कर्ज माफ हो सकता है, तो इन गरीब मजदूरों का क्यों नहीं? सरकार चुनने में सबसे बड़ी भागीदारी इन्हीं असंगठित मजदूरों की है, लेकिन आज इनके अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वहीं लेबर डेवलपमेंट फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भगवानदास सिंह यादव ने कहा कि जब तक मुक्त कराए गए मजदूरों का सही तरीके से पुनर्वास नहीं होगा और उनके बच्चों को शिक्षा से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक रोजी-रोटी के लिए यह पलायन और बंधुआ मजदूरी का दुष्चक्र नहीं रुकेगा। मुक्त हुए सभी मजदूर बांदा जिले के अलग-अलग गांवों के रहने वाले है ग्राम पून (बबेरू)अशोक कुमार (40 वर्ष), आशा देवी (38 वर्ष), खुशबू (16 वर्ष), खुशिया (14 वर्ष), शारदा प्रसाद (5 वर्ष),ग्राम चूहका पुरवा (ओरन अतर्रा) बबलू कुमार (35 वर्ष), कल्ली देवी (30 वर्ष), अजय (9 वर्ष), बीरू (7 वर्ष), सत्यम (3 माह), रमेश (24 वर्ष), शिवराम (40 वर्ष)। गांव बिसंडी (बिसंडा)नीरज (31 वर्ष), प्रियंका (30 वर्ष), मनोज (10 वर्ष), महिमा (8 वर्ष), प्रांशी (4 वर्ष), दीपक (2 वर्ष) फिलहाल ये सभी पीड़ित अपने घर लौट आए हैं, लेकिन अब इन्हें सरकारी आर्थिक मदद, पुनर्वास और अपने हक के मुक्ति प्रमाण पत्र का इंतजार है।


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