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Tuesday, September 29, 2026

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ने विद्वानों ने तुलसी साहित्य पर किया मंथन

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि : अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान अयोध्या और हिंदी विभाग गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कर्वी के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा में तुलसीदास और उनका साहित्य” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें देशभर से आए विद्वानों ने तुलसी साहित्य के विविध पक्षों पर विचार रखे। कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. सीमा कुमारी ने कहा कि तुलसीदास का साहित्य भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति, लोकचेतना, मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं से गहराई से जुड़ा है। नई पीढ़ी को तुलसी साहित्य से जोड़ना आवश्यक है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झाँसी के हिंदी विभाग के प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि तुलसीदास को केवल भक्ति कवि मानना उनके साहित्य के व्यापक स्वरूप को सीमित करना


होगा। रामचरितमानस में भारतीय ज्ञान परंपरा, दर्शन, संस्कृति और लोकजीवन के अनेक सूत्र लोकभाषा में अभिव्यक्त हुए हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्त्री अध्ययन विभाग से डॉ. सुप्रिया पाठक ने स्त्री पात्रों और स्त्री-दृष्टि से तुलसी साहित्य के पुनर्पाठ की आवश्यकता बताई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के डॉ. सुजीत कुमार सिंह ने शास्त्रीय ज्ञान और लोकानुभव के बीच तुलसी के साहित्य में दिखाई देने वाले संवाद को रेखांकित किया। संयोजक डॉ. गौरव पांडेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा को निरंतर संवाद और पुनर्व्याख्या की परंपरा बताया। विभिन्न सत्रों में विद्यार्थियों व शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। संचालन डॉ. वंशगोपाल व धन्यवाद ज्ञापन डॉ नीरज कुमार ने किया। संगोष्ठी में विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने भी सक्रिय सहभागिता की और तुलसीदास के साहित्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। विभिन्न सत्रों में तुलसी साहित्य के दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषिक, स्त्री-विमर्शात्मक, लोकमंगल तथा समकालीन संदर्भों पर चर्चा हुई।


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