चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि : परमहंस संत बाबा उमाकांत महाराज ने दशहरा पर्व पर आयोजित सत्संग में कहा कि मन रूपी रावण का अंत करके ही मनुष्य अपने भीतर प्रभु श्रीराम का दर्शन कर सकता है। वक्त गुरु द्वारा बताई गई साधना के माध्यम से मन पर विजय प्राप्त कर प्रभु और देवी-देवताओं के दर्शन संभव हैं। उन्होंने कहा कि जब साधक को अपने भीतर प्रभु के दर्शन होते हैं और उनकी आवाज सुनाई देती है, तभी विश्वास दृढ़ होता है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई ‘देखे बिनु न होइ परतीती, बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती‘ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बिना अनुभव के विश्वास और प्रेम की अनुभूति कठिन है। कहा कि संसार की मोह-माया में उलझकर मनुष्य जीवन की
नश्वरता को भूल जाता है। जबकि मृत्यु निश्चित है और सांसारिक वस्तुएं यहीं रह जाएंगी। इस सत्य को याद रखकर साधना में मन लगाना चाहिए। उन्होंने नियमित साधना पर जोर देते हुए कहा कि मन चंचल होता है और शुरुआत में साधना में बाधा डालता है। लेकिन दृढ़ संकल्प के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम समय निकालकर अभ्यास करने से मन नियंत्रित होने लगता है। उन्होंने कहा कि जब मन साधना के आगे हार मान लेता है, तभी वास्तविक अर्थों में मनुष्य का दशहरा होता है।


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