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Sunday, December 24, 2023

कोरोना का फिर दस्तक

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

भारत में कोरोना के नए सब-वेरिएंट JN.1 ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। यह दुनिया के 40 देशों में फैल चुका है। भारत में अब तक इसके 21 मामले सामने आए हैं। कोरोना के सभी मामलों को देखा जाए तो बुधवार को देश भर में 624 नए केस मिले, जो 21 मई 2023 के बाद से यानी पिछले सात महीनों में एक दिन में दर्ज हुई सबसे ज्यादा संख्या है। पिछले दो सप्ताह में भारत में कोरोना से 16 मौतें हुई हैं।वैसे तो कोरोना की पिछली लहरों के मुकाबले यह संख्या गंभीर नहीं कही जाएगी, लेकिन शुरू में धीरे और फिर तेजी से फैलाव की इसकी प्रवृत्ति को देखते हुए किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरती जा सकती। इसीलिए सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया है। बुधवार को राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने टेस्टिंग बढ़ाने, सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करने और सभी केसों की रिपोर्टिंग करने पर जोर दिया।महामारी शुरू होने के बाद से ही हम कोरोना के चले जाने और इसके फिर से आ धमकने की घोषणाएं सुनते रहे हैं। यह बात समझने की है कि कोरोना वायरस कभी गया नहीं था। न ही यह जाएगा। यह हमारे इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुका है और यहीं बना रहेगा। समय-समय पर इसके नए-नए वेरिएंट आते रहेंगे और हमें उनसे बचने और निपटने के तरीके अपनाते रहने


होंगेजहां तक इसके नए सब-वेरिएंट JN.1 का सवाल है तो WHO ने भी इस पर नजर रखने की जरूरत बताई है। यह ऐसे समय उभरा है, जब पहले टीका ले चुके या इसकी चपेट में आ चुके लोगों में बनी एंटी बॉडी कमजोर हो चुकी है। इसके अलावा यह ठंड का मौसम है, जो वायरस के अनुकूल पड़ता है।लेकिन दो-तीन दिनों का हल्का खांसी-बुखार भी न केवल लोगों की सेहत पर असर डालता है बल्कि दफ्तर में मौजूदगी को भी प्रभावित करता है। ऐसे में इसे हलके में लेने का कोई कारण नहीं है। अच्छी बात यह है कि जानकारों के मुताबिक चाहे नया सब-वेरिएंट हो या कोरोना के पुराने वेरिएंट, अच्छी क्वॉलिटी का फेस मास्क इससे बचाव का कारगर साधन है। इसलिए घबराने की बात नहीं है, लेकिन भीड़-भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और अन्य सावधानियां बरतना हमें बड़ी परेशानियों से बचा सकता है।सच तो ये है कि कोविड वायरस कभी गया नहीं था और न जाएगा। अब वो हमारे वातावरण का हिस्सा बन गया है। वो बदलता रहता है। कभी बढ़ता है तो कभी कम होता है। नए रूप आते हैं और जाते हैं। मौसम बदलता है तो सांस से फैलने वाले वायरसों को फैलने में मदद या बाधा पहुंचती है। ये सब तब होता है जब लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम होती है। कमजोर लोग ज्यादा संक्रमित होते हैं और उनमें बीमारी गंभीर हो सकती है।

ये नए रूप भी अलग-अलग होते हैं। कुछ ज्यादा फैलते हैं, कुछ इम्यूनिटी को धोखा देते हैं और कुछ ज्यादा गंभीर रूप से बीमार करते हैं। किसी नए रूप से खतरा कितना होगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों में पहले से कितनी रोग प्रतिरोधक क्षमता है (शरीर या वैक्सीन से बनी), और वायरस का वो रूप कितना गंभीर है। इस नजरिए से ही हमें JN.1 के बारे में चिंता करनी चाहिए और उसके हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वायरस को अपनी नकल बनाने के लिए जिंदा कोशिकाओं की जरूरत होती है। जब वो जल्दी-जल्दी नकलें बनाता है तो उसमें गड़बड़ी हो सकती है, इसी से नए रूप बनते हैं। ये नए रूप कितने फैलेंगे ये इस बात पर निर्भर करता है कि वो कोशिकाओं में कितनी आसानी से घुस सकते हैं। जो अच्छे से घुस पाते हैं वो ज्यादा फैलते हैं और ज्यादा समय तक रहते हैं। दूसरे जल्दी खत्म हो जाते हैं। जैसे लोगों की इम्यूनिटी बढ़ती है और मौसम बदलता है, सांस से फैलने वाले वायरस कम हो जाते हैं लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं होते। उनके जीन कम मात्रा में हवा में रहते हैं या फिर उन लोगों के शरीर में फिर जिंदा हो सकते हैं जिन्हें वो पहले बीमार कर चुके थे।

ओमिक्रोन 2021 में आया और तब से मुख्य वेरिएंट बना हुआ है, लेकिन इसके कई सब-वेरिएंट भी आए हैं। हर नया रूप कुछ समय के लिए मुख्य बनता है, फिर कोई नया आ जाता है जिसका स्पाइक प्रोटीन ज्यादा आसानी से फेफड़ों की कोशिकाओं में घुसता है। ये नए रूप पहले बनी इम्यूनिटी को भी ज्यादा धोखा दे सकते हैं। लेकिन पूरी तरह से धोखा देने का अभी तक कोई सबूत नहीं मिला है। शायद इसलिए क्योंकि स्पाइक प्रोटीन पूरी तरह से नहीं बदला है और शरीर की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काम कर रही है।अभी तक जितने भी ओमिक्रोन के सब-वेरिएंट आए हैं, वो मूल वायरस या उसके बाद के डेल्टा जैसे रूपों से कम गंभीर साबित हुए हैं। इन्होंने ज्यादा लोगों को संक्रमित किया है लेकिन कम मौतें हुई हैं। ये देखना बाकी है कि जेएन.1 भी ऐसा ही रहेगा या नहीं। अभी तक दुनिया के दूसरे देशों के अनुभव से ये पता नहीं चलता कि वायरस ज्यादा गंभीर हुआ है। यहां तक कि केरल से भारत के पहले मामले में भी 79 साल की महिला बीमार तो हुई लेकिन उसकी बीमारी हल्की ही थी।

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