धरातल पर पानी को तरस रही बुंदेलखंड की धरती।
बांदा, के एस दुबे । विश्व पर्यावरण दिवस आज के दिन बांदा सहित पूरे बुंदेलखंड में हर तरफ पौधरोपण की होड़ मची है। नेता, अधिकारी, सामाजिक संगठन और आम लोग हाथों में खुरपी और पौधा थामकर कैमरे के सामने मुस्कुराते नजर आ रहे हैं। कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर तस्वीरों की बाढ़ आ जाएगी और कल अखबारों के पन्ने इन सुर्खियों से पटे होंगे। लेकिन इन खूबसूरत तस्वीरों के पीछे छिपा एक कड़वा और यक्ष प्रश्न हम सभी के सामने मुंह बाए खड़ा हैकृ क्या केवल एक दिन पौधा लगाकर तस्वीरें खिंचवा लेने से पर्यावरण की रक्षा हो जाएगी? क्या सिर्फ इस औपचारिकता से बुंदेलखंड की तपती धरती शांत हो पाएगी? देश के सबसे गर्म जिलों में गिने जाने वाले बांदा की जमीनी हकीकत इन तस्वीरों से कोसों दूर और बेहद डरावनी है। जून के इस महीने में यहां आसमान
से आग बरस रही है और लोग भीषण गर्मी से बेहाल हैं। तालाब और पारंपरिक जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। गांव-गांव में पेयजल के लिए हाहाकार मचा हुआ है और पानी के संकट से तंग आकर ग्रामीण सड़कों पर चक्काजाम करने को मजबूर हैं। बुंदेलखंड का पर्यावरण लगातार गहरे संकट की ओर बढ़ रहा है। सबसे बड़ा विरोधाभास और दुखद पहलू यह है कि आज जो लोग पर्यावरण संरक्षण के नाम पर मंचों से लंबे-चैड़े भाषण दे रहे हैं या तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, उनमें से कई लोग साल भर प्रकृति के विनाश पर पूरी तरह मौन रहते हैं। नदियों का सीना छलनीरू बुंदेलखंड की जीवनदायिनी नदियों का सीना अवैध खनन के जरिए दिन-रात खोखला किया जाता है, तब ये पर्यावरण प्रेमी कहां होते हैं?
संसाधनों का दोहनरू प्राकृतिक संपदा को लूटने और भूजल को पाताल में धकेलने का खेल साल के 364 दिन बदस्तूर जारी रहता है।साल भर प्रकृति को लहूलुहान करना और फिर 5 जून को एक पौधा लगाकर खुद को श्पर्यावरण प्रेमीश् साबित करने का यह पाखंड अब बंद होना चाहिए। इसे किसी भी लिहाज से पर्यावरण संरक्षण नहीं कहा जा सकता। दिखावा नहीं, अब आत्ममंथन और निरंतर प्रयास की जरूरत पर्यावरण दिवस कोई सालाना उत्सव या महज एक दिन की औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन है। यह सोचने का दिन है कि हमने प्रकृति से कितना लिया और बदले में उसे क्या लौटाया?अगर वास्तव में बुंदेलखंड और बांदा को बचाना है, तो हमें श्फोटो सेशनश् की संस्कृति से बाहर निकलना होगा और साल भर ये संकल्प निभाने होंगे। केवल पौधा लगाना काफी नहीं है, जब तक वह पेड़ न बन जाए, उसकी सुरक्षा और सिंचाई की जिम्मेदारी लेनी होगी। बुंदेलखंड की सूखी धरती और हांफती नदियां अब और दिखावा बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। प्रकृति को बचाने के लिए अब रस्म अदायगी नहीं, बल्कि निरंतर, ईमानदार और जमीनी प्रयासों की सख्त आवश्यकता है। वरना आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।


No comments:
Post a Comment