अवैध लकड़ी कटान और कांटों के संचालन की शिकायतें, हरे-भरे पेड़ों के उजड़ने पर जांच की मांग
बांदा, के एस दुबे । जनपद के वन विभाग में कथित भ्रष्टाचार और अवैध लकड़ी कटान को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि जिले में वन विभाग से जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत से लकड़ी कटान का अवैध कारोबार संचालित हो रहा है। वहीं, विभाग में धर्मेंद्र नामक बाबू की कई वर्षों से तैनाती को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, क्षेत्र में कथित तौर पर अवैध लकड़ी के कांटे संचालित हो रहे हैं और हरे-भरे पेड़ों का कटान किया जा रहा है। यह भी आरोप है कि जंगल से लकड़ी काटने के लिए कुछ लोगों को कथित रूप से अनुमति दी जाती है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह पर्यावरण संरक्षण और वन संपदा की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वर्षों से तैनाती पर उठे सवाल
आरोप है कि धर्मेंद्र नामक बाबू लंबे समय से वन विभाग में तैनात हैं। उनकी लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनाती को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कथित मिलीभगत के जरिए लकड़ी कारोबार से जुड़े लोगों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। अधिकारियों तक रकम पहुंचाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
हरे-भरे पेड़ों की कटान पर कौन लगाएगा रोक?
वन संपदा की सुरक्षा की जिम्मेदारी वन विभाग की है। ऐसे में यदि क्षेत्र में अवैध कटान और बिना वैध अनुमति के लकड़ी का कारोबार हो रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। सवाल यह भी है कि कथित अवैध गतिविधियों की जानकारी संबंधित अधिकारियों को है या नहीं और अब तक इस दिशा में क्या कार्रवाई की गई है?
निष्पक्ष जांच की मांग
मामले में धर्मेंद्र नामक बाबू की तैनाती, लकड़ी कटान की अनुमतियों, लकड़ी के कांटों के लाइसेंस तथा वन संपदा के अवैध दोहन से संबंधित अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कराए जाने की आवश्यकता है। साथ ही, संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सके। अब देखना होगा कि वन विभाग के उच्चाधिकारी इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए जांच कराते हैं या मामला फाइलों तक ही सीमित रह जाता है। जब पूरे मामले की जानकारी बाबू धर्मेंद्र से लेनी चाहि तो उन्होंने अपना फोन ही नहीं रिसीव किया पक्ष आने पर खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


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