चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि : कुबेरगंज निवासी योगाचार्य रमेश सिंह राजपूत ने रविवार को नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास कराते हुए इसके लाभों की जानकारी दी। उन्होंने बतायाकि श्वास लेना (पूरक), श्वास को अंदर रोकना (अंतः कुंभक), श्वास छोड़ना (रेचक) और श्वास को बाहर रोकना ( बाह्य कुंभक) को जब किसी ध्यानात्मक आसन में बैठ कर विशेष अनुपात जैसे 1ः4ः2ः2 अर्थात 4 सेकंड तक सांस को धीरे धीरे अंदर लिया, 16 सेकंड तक अंदर रोका, 8 सेकंड तक बाहर छोड़ा और 8 सेकंड तक बाहर रोक दिया। इस प्रकार के ध्वनि रहित सांसों के नियंत्रण को नाड़ी शोधन प्राणायाम कहते हैं। यह अनुलोम विलोम प्राणायाम की उन्नतशील प्रक्रिया है। योगाचार्य ने बताया कि जब इसका प्रातः
खाली पेट कम से कम नौ बार लगातार अभ्यास किया जाता है तो मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध शुद्ध होने लगते हैं, नसों और 72000 सूक्ष्म ऊर्जा नाड़ियों का तनाव मिटने लगता है और पूरा तंत्र शुद्ध और शांत हो जाता है। जीवन में उत्साह और नवीन सकारात्मक विचारों का आगमन होने लगता है, व्यक्तित्व में आकर्षण, सदाचार और उत्कृष्ट व्यवहार प्रदर्शित होने लगता है। रोग जड़ से मिटने लगते हैं। शरीर मन बुद्धि चित्त और आत्मा के शुद्धिकरण के लिए अद्भुत योग है। आध्यात्मिक उपलब्धियां का आधार है। जीवन को आनंदमय बनाने के लिए इसका अभ्यास अवश्य करें।


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