कथाव्यास ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का भक्तों को कराया रसपान
अतर्रा, के एस दुबे । मित्रता हो तो श्री कृष्ण और सुदामा जैसी। सच्चा मित्र वही है जो मित्र के दुख सुख का साथी हो और उसके हित को सर्वोपरी रखे। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखा दीनहीन सुदामा को न केवल गले लगाया, बल्कि उनका उद्धार भी किया। कस्बे के नरैनी रोड में चल रही संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिवस शनिवार को कथाव्याास रजनीश शरण ने सुदामा चरित्र की कथा का रसपान कराते हुए यह बात कहीं। यह कथा सुनकर सभी श्रोताओं की आंखे नम हो गई। कथाव्यास ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि मित्रता करो, तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और
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| कथा सुनाते हुए कथावाचक रजनीश शरण महाराज |
बिना बताए ही उसकी मदद कर दे, परंतु आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता है, मित्रता खत्म हो जाती है। उन्होंने कहा कि सुदामा संसार मे श्रीकृष्ण के सबसे अनोखे भक्त थे। वह जितने गरीब नजर आते थे, मन से उतने ही धनवान थे। सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र श्री कृष्ण से मिलने द्वारिकापुरी जा पहुँचते हैं और द्वार पर खड़े प्रहरियों से कहते है कि वह कृष्ण के मित्र है और अंदर राजमहल में जाकर उनसे मिलना चाहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उपहास उड़ाते
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| मौजूद श्रोतागण। |
है। एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर एक सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और अपने आपको आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं और अपने मित्र सुदामा को रोककर गले लगा लेते हैं। इस प्रकार कथा व्यास ने मित्रता धर्म के बारे में बताया। कथा यजमान अनूप गुप्ता पत्नी शोभा गुप्ता ने हवन पूजन कर कथा का समापन किया। कथा पंडाल में अतुल गुप्ता, अजय, अभय, अंशुल, घनश्याम गुप्ता, रामनरेश, विनय, शाश्वत गुप्ता सहित अन्य श्रोतागण उपस्थित रहे।



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