मृदा एवं जल संरक्षण अभियांत्रिकी विभाग के छात्र प्रदीप सिंह परिहार का लेख
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । बुंदेलखंड, यह नाम सुनते ही मन में सूखे की तस्वीर उभर आती है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक धरोहर और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है, लेकिन आज यह जल संकट का प्रतीक बन चुका है। यहां की मिट्टी कठोर चट्टानी है, वर्षा अनियमित और भूजल स्तर लगातार बदल रहा है। इस लेख में हम बुंदेलखंड में भूजल की गतिशीलता का विस्तृत मूल्यांकन करेंगे इसके भूगोल से लेकर वर्तमान स्थिति, समस्याओं, प्रभावों और समाधान तक। यह आकलन विभिन्न सरकारी रिपोर्टों, अध्ययनों और क्षेत्रीय सर्वेक्षणों पर आधारित है, ताकि पाठक को पूरी तस्वीर मिल सके।
प्रदीय सिंह परिहार ने अपने लेख के माध्यम से बताया कि बुंदेलखंड क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सात जिलों (बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, महोबा) और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों (छतरपुर, दमोह, दतिया, पन्ना, निवाड़ी, टीकमगढ़ आदि) को मिलाकर लगभग 29,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह विंध्य पर्वतमाला और यमुना नदी के बीच स्थित है। भू-आकृति मुख्यतः पठारी और चट्टानी है- ग्रेनाइट, गनीस और विंध्यन चट्टानों से बनी। यहां की मिट्टी काली और लाल दोनों प्रकार की है, जो पानी को जल्दी सोखने नहीं देती। क्षेत्र की नदियां जैसे बेतवा, केन, पहुज, धसान और बागै मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर हैं। औसत वर्षा 800-1000 मिमी है, लेकिन 90 प्रतिशत पानी मात्र 40-50 दिनों में गिरता है। बाकी समय सूखा पड़ता है। भूजल यहां की जीवनरेखा है, क्योंकि सतही जल स्रोत सीमित हैं। कृषि, पेयजल और पशुपालन सब भूजल पर टिके हैं।
जल स्तर की गतिशीलताः ऐतिहासिक और वर्तमान स्थिति
भूजल स्तर की गतिशीलता का मतलब है इसका ऊपर-नीचे होना, रिचार्ज (पुनर्भरण) और निकासी का संतुलन। बुंदेलखंड में यह गतिशीलता काफी जटिल है। 2006 से 2016 तक के आंकड़ों के अनुसार, क्षेत्र के 60ः कुओं में पानी का स्तर 4 मीटर तक गिरा। कठोर चट्टानी एक्कीफर (जलभृत) के कारण पानी तेजी से नहीं रिचार्ज होता। 2024 के केंद्रीय भूजल बोर्ड के डायनामिक ग्राउंडवाटर असेसमेंट के अनुसार, बुंदेलखंड के 14 जिलों में से 10 जिले ‘सुरक्षित‘ श्रेणी में हैं, जबकि तीन जिले ‘क्रिटिकल‘ तथा अन्य ‘सेमी-क्रिटिकल‘ है। कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज और निकासी का अनुपात ज्यादातर जिलों में 70 प्रतिशत से कम है, जो अच्छा संकेत है। लेकिन कुछ जिलों जैसे चित्रकूट, छतरपुर और बांदा में निकासी का प्रतिशत 70-90 प्रतिशत या इससे अधिक पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश भाग में कुल वार्षिक निकासी लगभग 70 प्रतिशत के आसपास है, जबकि मध्य प्रदेश में 58 प्रतिशत। फिर भी, पूर्व-मानसून में पानी का स्तर 10-20 मीटर नीचे चला जाता है और पोस्ट-मानसून में कुछ सुधार होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि 2002-2017 के बीच भूजल स्टोरेज में औसतन 7.59 सेमी की गिरावट हुई, और 2032 तक यह और बिगड़ सकता है।
भू जल की स्थिति
अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तनः मानसून में भारी बारिश एक-दो घंटे में हो जाती है, जिससे रन-ऑफ बढ़ता है और रिचार्ज कम। पिछले 20 वर्षों में 13 सूखे पड़ चुके हैं। तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण बढ़ा है। कठोर भू-आकृतिः चट्टानी क्षेत्र में एक्कीफर की क्षमता कम। पानी की परत पतली और गहरी है। अति दोहनः गेहूं, चना जैसी फसलों के लिए बोरवेल और ट्यूबवेल का बढ़ता उपयोग। महोबा, चित्रकूट, ललितपुर जैसे जिलों में निकासी 70ः से ऊपर पहुंच गई। पारंपरिक संरचनाओं का क्षरणः हवेली, तालाब, चेक डैम सिल्ट से भर गए। पहले वर्षा का 15ः रिचार्ज होता था, अब कम। प्रदूषणः कीटनाशक और घरेलू कचरा भूजल को प्रभावित कर रहा है।
भविष्य की दिशा और सुझाव
भूजल गतिशीलता को स्थिर रखने के लिए फसल विविधीकरण के तहत कम पानी वाली फसलें (ज्वार, बाजरा) व ड्रिप-स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही हर वर्ष रिचार्ज संरचनाएं बनाना चाहिए तथा भूजल स्तर की निरंतर निगरानी करनी चाहिए। यदि हम आज कदम उठाएं, तो बुंदेलखंड का भूजल स्तर स्थिर हो सकता है। यह सिर्फ पानी की समस्या नहीं, बल्कि जीवन-जीविका और पर्यावरण की है।
निष्कर्ष
बुंदेलखंड की भूजल गतिशीलता एक चुनौती है, लेकिन अवसर भी। 2024 का आकलन सकारात्मक है, फिर भी सतर्कता जरूरी है। समुदाय, सरकार और वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से यह क्षेत्र जल-सुरक्षित बन सकता है।


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