सिर्फ फीता काटने के लिए खुली हैं चौकियां?
कागजों पर स्मार्ट पुलिसिंग?
क्या किसी बड़ी वारदात का है इंतजार?
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । जिले में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के दावे इन दिनों जमीनी हकीकत से टकराकर बिखरते नजर आ रहे हैं। पुलिस विभाग द्वारा लगातार नई चौकियों की स्थापना तो की जा रही है, लेकिन इन चौकियों की बुनियादी जरूरतों को जैसे नजरअंदाज कर दिया गया है। पुलिस लाइन गेट के बाहर स्थापित चौकी इसका सबसे जीवंत उदाहरण बन चुकी है, जहां बीते पांच महीनों से चौकी प्रभारी रामकुमार दुबे अकेले ही पूरे क्षेत्र की सुरक्षा का भार अपने कंधों पर ढो रहे हैं। न कोई हमराही, न सरकारी वाहन- बस एक निजी बाइक और जिम्मेदारियों का अथाह बोझ। स्टेशन रोड से लेकर खोह और आसपास के आधा दर्जन गांवों तक गश्त करना एक व्यक्ति के बूते से बाहर की चुनौती है, फिर भी यह जिम्मेदारी निभाई जा रही है। सवाल है कि जब चौकी में स्टाफ ही
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| चौकी का अकेला पुलिस इंस्पेक्टर |
नहीं, तो सुरक्षा का यह ढांचा आखिर किस भरोसे खड़ा है? यही नहीं, चौकी की साफ-सफाई और दैनिक संचालन जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं भी अधर में लटकी हुई हैं। स्थानीय लोगों में इस व्यवस्था को लेकर असंतोष साफ झलक रहा है। उनका मानना है कि यदि चौकियां सिर्फ उद्घाटन तक सीमित रह जाएं और उनमें संसाधनों का अभाव बना रहे, तो यह व्यवस्था महज कागजी साबित होगी। कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिए केवल चौकियां खोलना नहीं, बल्कि उन्हें संसाधनों और पर्याप्त बल से लैस करना भी उतना ही आवश्यक है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या विभाग इस सच्चाई को स्वीकार कर सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाएगा या फिर यह चौकी भी व्यवस्था की चुप्पी में गुम हो जाएगी।
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