आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है इस बार देवशयनी एकादशी तिथि 25 जुलाई को है इसी दिन से भगवान श्री हरि विष्णु अगले चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योग निद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास की शुरुआत होती है। चार माह के दौरान धरती का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं और इसी दौरान सावन का महीना आता है. जो कि भगवान शिव का प्रिय माह है ऐसा भी मत है कि भगवान विष्ण इस दिन से पाताल में राजा बाली के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते है। चार माह में तपस्वी भ्रमण नहीं करते एक ही स्थान पर रहकर तपस्या करते है। देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु के विग्रह को पंचामृत से स्नान कराकर धूप-दीप आदि से पूजन करना चाहिए, तदुपरान्त यथाशक्ति सोना-चाँदी आदि की शय्या के ऊपर बिस्तर बिछाकर और उस पर पीले रंग का रेशमी कपड़ा बिछाकर भगवान् विष्णु को शयन करवाना चाहिए
स्वास्थ एवं सम्पनता हेतु चातुर्मास में प्रतिदिन सूर्य को जल दे, भगवान विष्णु और भगवान शिव के मंत्रो का जाप करे। इन चार माह में मांगालिक कार्य नहीं किये जाते है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी पर ब्रह्म योग उपरांत इंद्र योग, सूर्य और उच्च के गुरु का पुष्य नक्षत्र संयोग आदि शुभ योगों का संयोग बन रहा है, जो इस दिन किए जाने वाले पूजा-पाठ और उपायों के फल को कई गुना बढ़ा देंगे। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी 24 जुलाई , शुक्रवार को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 25 जुलाई , शनिवार को सुबह 11 बजकर 34 मिनट पर होगा. ऐसे में उदयातिथि के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा. इस व्रत का पारण 26 जुलाई, रविवार को प्रात: किया जाएगा.


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