डॉक्टरों पर बाहर की महंगी दवाएं लिखने और कथित कमीशनखोरी के आरोप, कई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का दावा
बांदा, के एस दुबे । जिला अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि अस्पताल में तैनात कुछ चिकित्सक मरीजों को अस्पताल में उपलब्ध अथवा सस्ती जेनेरिक दवाओं के बजाय बाहर की महंगी ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। इतना ही नहीं, मरीजों को कथित रूप से कुछ निश्चित मेडिकल स्टोरों पर भेजा जाता है, जहां से दवाएं खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है।
स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क मरीजों की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर लाखों रुपये के कारोबार को बढ़ावा देता है। आरोप है कि इस व्यवस्था में कमीशनखोरी की भूमिका प्रमुख है, जिसके कारण गरीब और जरूरतमंद मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
"कमीशन के लिए लिखी जाती हैं महंगी दवाएं" – समाजसेवी का आरोप
एक समाजसेवी ने आरोप लगाया कि कुछ चिकित्सक जानबूझकर मरीजों को बरगलाते हैं और उन्हें यह कहकर बाहर भेजते हैं कि अस्पताल में आवश्यक दवा उपलब्ध नहीं है या बाहर की दवा अधिक प्रभावी होगी। इसके बाद मरीजों को कथित रूप से ऐसे मेडिकल स्टोरों का नाम बताया जाता है, जहां से दवा खरीदने पर कमीशन मिलने की आशंका जताई जाती है। समाजसेवी का कहना है कि यदि अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के स्थान पर लगातार बाहर की महंगी दवाएं लिखी जा रही हैं तो इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
कई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप
समाजसेवियों का दावा है कि इस संबंध में कई बार संबंधित अधिकारियों से शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन आज तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उनका आरोप है कि हर बार मामले में केवल औपचारिक जांच कर खानापूर्ति कर दी जाती है और शिकायतों का निस्तारण कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि मरीजों के हितों के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है।
गरीब मरीजों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
जिला अस्पताल में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज इलाज के लिए आते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से जुड़े होते हैं। सरकारी अस्पताल का उद्देश्य उन्हें कम लागत या निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि उन्हें बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ें तो उपचार का खर्च कई गुना बढ़ जाता है। इससे अनेक मरीज बीच में ही इलाज छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों और समाजसेवियों ने स्वास्थ्य विभाग तथा जिला प्रशासन से मांग की है कि जिला अस्पताल में लिखे जा रहे दवा पर्चों का विस्तृत ऑडिट कराया जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि किन परिस्थितियों में मरीजों को बाहर की दवाएं लिखी जाती हैं और क्या अस्पताल में संबंधित दवाएं उपलब्ध थीं। यदि किसी चिकित्सक, कर्मचारी या मेडिकल स्टोर की मिलीभगत सामने आती है तो उनके विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए।
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष
समाचार लिखे जाने तक जिला अस्पताल प्रशासन अथवा संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी थी। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


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