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Monday, August 17, 2026

31 हजार की आंधी से 8 हजार की जीत तक पलटी सदर की सियासत

वर्ष 2027 में दलित वोट बनेगा निर्णायक फैक्टर!

फतेहपुर, मो शमशाद । विधानसभा चुनाव की आहट के साथ फतेहपुर सदर की सियासत में भी हलचल तेज होने लगी है। पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजे इस सीट के बदलते राजनीतिक मिजाज की कहानी खुद बयां करते हैं। वर्ष 2017 में भाजपा के विक्रम सिंह ने सपा के चंद्र प्रकाश को 31,498 मतों के भारी अंतर से हराकर बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन महज पांच साल बाद 2022 में पूरा चुनावी गणित पलट गया। सपा के चंद्र प्रकाश ने वापसी करते हुए भाजपा के विक्रम सिंह को 8,601 मतों से शिकस्त दे दी। दोनों चुनावों के बीच जीत के अंतर में करीब 40,099 मतों का बड़ा बदलाव सामने आया। यही आंकड़ा अब 2027 से पहले सदर विधानसभा की सियासत को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है।

फोटो इंटरनेट।

दोनों चुनावों के आंकड़ों को एक साथ देखें तो पांच वर्ष में जीत के अंतर की दिशा में 40,099 मतों का बड़ा उलटफेर सामने आता है। यही बदलाव बताता है कि फतेहपुर सदर में मतदाताओं का रुख किसी एक दल के पक्ष में स्थायी मानना राजनीतिक दलों के लिए बड़ी भूल साबित हो सकती है। अब संभावित 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सदर की सियासत में दलित मतदाताओं की भूमिका पर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। बसपा का इस वर्ग में परंपरागत प्रभाव रहा है, वहीं भाजपा और सपा समेत अन्य दल भी अपने-अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। सदर सीट पर भी दलित मतदाताओं का रुख चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि किसी भी सामाजिक वर्ग को एकमुश्त वोट बैंक मानना सही नहीं होगा। स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की छवि, विकास कार्य, रोजगार, महंगाई, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं का असर भी मतदाताओं के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पीडीए बनाम सामाजिक समीकरणों की भी होगी परीक्षा

2027 के चुनाव में दलित मतदाताओं के साथ पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, युवा और महिला मतदाताओं की पसंद भी महत्वपूर्ण होगी। सपा अपने पीडीए समीकरण को मजबूत करने की कोशिश करेगी, भाजपा अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने की रणनीति पर आगे बढ़ सकती है, जबकि बसपा अपने परंपरागत दलित आधार को फिर से सक्रिय करने के प्रयास में रहेगी। कांग्रेस और अन्य दल भी अपने लिए राजनीतिक जमीन तलाशेंगे। ऐसे में चुनाव केवल जातीय समीकरणों का खेल नहीं होगा। प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की सक्रियता, स्थानीय समस्याएं और जनता के बीच स्वीकार्यता भी परिणाम को प्रभावित करने वाले अहम कारक होंगे।


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