देवेश प्रताप सिंह राठौर
देश में महिलाओं के उत्पीड़न, दुष्कर्म और घरेलू हिंसा जैसी मानवता को कलुषित करने वाली घटनाएं समूचे राष्ट्र को विश्व पटल पर कलंकित कर रही हैं। इस तरह की अमानवीय घटनाएं देश के प्रत्येक संवेदनशील नागरिक की अंतरात्मा को झकझोर कर रख देती हैं, और हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि यह वास्तव में कमजोर सरकारी तंत्र और लचर सुरक्षा व्यवस्था का परिणाम मात्र है या फिर हमारी संवेदनहीनता भी किसी हद तक इन घटनाओं की जिम्मेदार है।
क्या कानून-व्यवस्था और सरकारी तंत्र को कोसने तथा नियमों में सख्ती की मांग उठाने के साथ-साथ हमें अपनी सोच और सामाजिक परिवेश को बदलने की जरूरत नहीं है? हम किसी वीभत्स घटना के बाद ही उद्वेलित होकर सड़कों पर उतरते हैं, उसे देशव्यापी आंदोलन का रूप देते हैं; परंतु यह जनाक्रोश तभी सार्थक है जब इसकी परिणति किसी ठोस बदलाव में हो। विडंबना यह है कि समय बीतने के साथ हम सब कुछ भूलकर फिर उसी ढर्रे पर जीने लगते हैं।
पश्चिमी अंधानुकरण की होड़ में हम अपनी मूल संस्कृति और नैतिक मूल्यों से लगातार दूर होते जा रहे हैं। फिल्मों और विज्ञापनों में स्त्री का बाजारीकरण कर उसे महज उपभोग की वस्तु समझ लेना एक आम प्रवृत्ति बन चुकी है। हम बेटियों के बाहर निकलने, उनके पहनावे और आचरण पर तो बंदिशें लगाते हैं, जबकि असल आवश्यकता बेटों को नारी-सम्मान के संस्कार देने की है। महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों को संजोने का दावा करने वाले समाज के नीति-नियंताओं के मुंह पर भी करारा तमाचा हैं।
अधिकांश महिलाएं आज भी चारदीवारी के भीतर घरेलू हिंसा और प्रताड़ना सहने को विवश हैं। सरकारें कड़े कानून बनाने की बात करती हैं और बुद्धिजीवी आधुनिक जीवनशैली को दोष देकर पल्ला झाड़ लेते हैं, परंतु समाज अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। विडंबना देखिए कि अक्सर घटनाओं के बाद पीड़िता से ही सवाल किए जाते हैं, उसकी आपबीती को उपहास का विषय बनाया जाता है और अंततः उसे ही लज्जित होना पड़ता है। यह सामाजिक रवैया पीड़िता को कुंठा की ओर धकेलता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है।
हमें स्पष्ट रूप से यह तय करना होगा कि दुष्कर्म या उत्पीड़न पीड़िता के लिए लज्जा का विषय नहीं, बल्कि अपराधी और समूचे समाज के लिए शर्म की बात है। ऐसे मामलों में समझौते का दबाव बनाना या लीपापोती करना अक्षम्य अपराध है। उन तथाकथित पंचायतों और सामाजिक अगुवाकारों पर भी सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, जो पीड़िता पर सामाजिक तिरस्कार और बेतुके समझौते थोपते हैं।
जब तक समाज दुराचारियों का पूर्ण बहिष्कार नहीं करेगा और स्त्री के स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखने का संकल्प नहीं लेगा, तब तक केवल कड़े कानूनों से नारी सुरक्षित नहीं हो सकती। हमारी संस्कृति में नारी सदैव पूजनीय रही है, और उसके आत्मसम्मान की रक्षा करना हर नागरिक का नैतिक दायित्व है।


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