नगर में निकाली गई शोभायात्रा
चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि। तुलसी जन्मस्थली राजापुर के प्रसिद्ध तुलसी घाट में माँ यमुना के तट पर कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी एवं द्वादशी को तुलसी एवं भगवान सालिग्राम के विवाह की परम्पराओं का निर्वाह बड़े धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ विद्वान पण्डितों के द्वारा वेद मंत्रों के साथ विवाह सम्पन्न कराया गया। इसके बाद महिलाओं के द्वारा सालिग्राम भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की प्रतिमाओं को लेकर नगर में बारात निकालते हुए शोभा यात्रा निकाली गई। जिसमें नर, नारियों एवं व्यापारियों ने भगवान सालिग्राम, माँ तुलसी की पूजा अर्चना द्वार-द्वार पर की गई।

शोभायात्रा निकालते भक्तगण।
कार्तिक मास प्रारम्भ होते ही नगर की महिलाएँ प्रातः काल माँ कालिन्दी में स्नान कर प्रतिदिन पूजा अर्चना करती रहीं। देवोत्थान एकादशी एवं द्वादशी को व्रत रखकर माँ कालिन्दी के तट पर सेवा निवृत्त विद्युत विभाग के अवर अभियंता सन्तोष कुमार मिश्रा व पत्नी रुक्मिणी मिश्रा द्वारा रवितनया के तट पर विद्वान पण्डितों एवं वेदमंत्रों के साथ माँ तुलसी एवं सालिग्राम का विवाह हिन्दू रीति रिवाज परम्परा के अनुसार बैंड बाजा के साथ कन्यादान की रश्म अदायगी पूर्ण की तथा कन्यादान में सोने, चांदी के आभूषण एवं वस्त्र के अलावा बर्तन अन्य का दान विद्वान पण्डितों को दिया। विद्वान पण्डित बिहारीलाल द्विवेदी, रामनरेश द्विवेदी व गंगाप्रसाद पाण्डेय ने बताया कि भगवान शिव के द्वारा उत्पन्न किए गए जालन्धर नामक बालक ने कड़ी तपस्या करके त्रिय देवताओं से वरदान प्राप्त किया था कि जिस व्यक्ति को छू लेगा वह भस्म हो जाएगा। इस वरदान को पाकर बालक जालन्धर अहंकारी एवं दैत्य का रूप धारण कर देवताओं को परेशान करने लगा जिस पर भगवान शिव ने परम पिता परमात्मा विष्णु भगवान से सारी कहानी सुनाई। भगवान शिव ने बताया कि दैत्य जालन्धर की पत्नी वृन्दा सतियों में सिरोमणि होने के कारण उस दैत्य का वध नहीं किया जा सकता लेकिन क्षल पूर्वक भगवान विष्णु ने जालन्धर रूप धारण कर उसकी पत्नी के सतित्व को नष्ट कर दिया। तभी भगवान शिव के द्वारा जालन्धर दैत्य का वध हो सका। जब सती वृन्दा को ज्ञान हुआ तो सती ने भगवान विष्णु को शिला स्वरूप होने का श्राप दे दिया। तभी भगवान विष्णु ने कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में पैदा होगी और बिना तुम्हारे पूजा अर्चना, यज्ञ अधूरे रहेंगे तथा तुलसी रूप में तुम हर हमेशा मेरे सिर पर लोग तुम्हें चढाएंगे। तभी से कार्तिक मास की देवोत्थानी एकादशी एवं द्वादशी के दिन तुलसी सालिग्राम के विवाह की परम्परा चली आ रही है।

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