देवेश प्रताप सिंह राठौर
वरिष्ठ पत्रकार
हम भारत देश में हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं आप बताइए एक मामला बहुत तेजी से आस्था सिंह एचडीएफसी बैंक की ऑफिसर ने अगर ठाकुर कह दिया तो उसने क्या गलती की ठाकुर है तो ठाकुर कह दिया अगर ब्राह्मण है ब्राह्मण कह देता है बनिया है बनिया कह दिया जाता है, लाला है श्रीवास्तव है सबको बोला जाता है, और जो आरक्षण पाते हैं अगर उनकी जाति के आधार पर बोल दिया जाए तो जाति सूचक शब्द हो गया मुकदमा कायम हो जाता है,अरे भाई आप जाति के आधार पर आरक्षण तो ले रहे हो तो उसे जाति पर गर्व करो जो आरक्षण के रूप में आपको नौकरी दे रही है बहुत सारी सुविधाएं प्राप्त हो रही है और अगर जैसे पंडित को पंडित कहा जाता है ब्राह्मण को ब्राह्मण कहा जाता है वैसे आप जी जाति के हैं अगर कोई कुछ कह देता तो उसमें बुरा नहीं मानना चाहिए मेरे
हिसाब से यह सब कानून किस तरह से बनाए गए व्यवस्थाएं कैसी हैं इस पर जाना नहीं चाहता लेकिन इतना जरूर कहूंगा जब जाति है उसे जाति के आधार पर आप लाभ पा रहे हैं, रिजर्वेशन का तो अपनी जाति का नाम लिखने में या कोई आपकी जाति को संबोधन कर देता है, कोई व्यक्ति तो उसे पर मुकदमा कायम कर दिया जाना यह क्या न्याय उचित है। इस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट को ध्यान देना चाहिए इस तरह का व्यवहार जातियों के आधार पर होना ठीक नहीं है जब सभी जाति अपना नाम ले सकती हैं तो आरक्षण वाली जाति अपनी जाति का नाम लेने से क्यों संकोच करती हैं, यह तो आरक्षण लेना बंद कर दें, वहां तो आरक्षण चाहिए नौकरी भी चाहिए और अपनी जाति को छुपाना भी है यह दोहरी राजनीति ठीक नहीं कभी भी इस देश में इस तरह की धारणा रही कभी भी एक जुट नहीं हो पाएगा हिंदू यह मेरा विश्वास है। देश में बहुत सी राष्ट्रीय पार्टी है क्षेत्रीय पार्टी हैं जो जाति के आधार पर भाषण देती हैं दलित ओबीसी अन्य एससी एसटी जाति का अपने को बताते हैं, और बड़ी-बड़ी रैलियां में डंके की चोट पर बोलते हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। क्या यही लोकतंत्र है।


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