चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि : उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम एवं जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के चैथे दिन भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर विद्वानों ने अपने शोधपरक आलेख प्रस्तुत किए। प्रथम सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय ने कार्यशाला के सफल आयोजन पर शुभकामनाएं देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा के नए सोपानों को सामने लाने में सहायक होंगे। इस दौरान कुलसचिव मधुरेंद्र कुमार पर्वत भी मौजूद रहे। शिक्षा संकाय के सहायक आचार्य डॉ. विश्वेश दुबे ने कहा कि विश्वविद्यालय के संस्थापक जगद्गुरु स्वामी श्री रामभद्राचार्य भारतीय ज्ञान परंपरा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मनोविज्ञान विभाग की प्रभारी डॉ. अमिता त्रिपाठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के मनोवैज्ञानिक तत्वों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में शामिल करने की
जरूरत बताई। अध्यक्षता कर रहे अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय के डॉ. तरुण कुमार शर्मा ने इसे मूल्यपरक एवं जनोपयोगी शिक्षा का आधार बताया। विशिष्ट अतिथि प्रो. मनोज कुमार द्विवेदी ने संस्कृत एवं संस्कृति के उत्थान में इसकी उपयोगिता बताई। डॉ. शिवशंकर शुक्ला ने वेद और उपनिषदों के ज्ञान को वर्तमान समय के लिए उपयोगी बताया। द्वितीय तकनीकी सत्र में वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल रूप में जनसामान्य तक पहुंचाने, वेद-उपनिषदों के ज्ञान को जनोपयोगी बनाने और समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया। राजनीति विज्ञान के डॉ. सुशील त्रिपाठी ने विद्यार्थियों तक शाश्वत ज्ञान पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता बताई। इतिहास विभाग की डॉ. प्रतिमा कुमारी शुक्ला ने वैश्विक ज्ञान को जनसामान्य तक पहुंचाने, जबकि ललित कला विभाग की डॉ. संध्या पांडेय ने कला एवं सृजनात्मकता के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रसार पर जोर दिया। कार्यशाला का संचालन संस्कृत विभाग की प्रभारी डॉ. प्रमिला मिश्रा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. शांत कुमार चतुर्वेदी ने किया। शोध छात्र देवदत्त, रूबी शुक्ला, इच्छा उपाध्याय और सुनील कुमार ने भी शोधपरक आलेख प्रस्तुत किए।


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