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Thursday, June 4, 2020

घरेलू कामगार महिलाओं पर गहराता आर्थिक संकट

घरेलू कामगारों को मिले आर्थिक मदद और काम का अधिकार

भोपाल, अंकित जैन । प्रदेश की लाखों घरेलू कामगार महिलाएं लॉकडाउन के बाद से ही अपने काम को लेकर चिंतित हैं। मार्च महीने में 10 दिन काम नहीं करने के बावजूद लगभग 80 फीसदी लोगों ने तो इन महिलाओं को पूरा वेतन दे दिया, लेकिन अप्रैल और मई महीने में बिना काम के इन्हें अधिकांश घरों से वेतन नहीं मिल पाया। यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो ये लाखों परिवार आर्थिक एवं सामाजिक संकट में फंस जाएंगे।
अनलॉक 1 यानी लॉकडाउन के नए चरण में जब कंटेंमेंट क्षेत्र को छोड़कर सभी जगह अधिकांश गतिविधियां शुरू कर दी गई है, तब भी सरकार इन महिलाओं की कोई सुध नहीं ले रही है। रहवासी समितियों द्वारा इनके कैम्पस, अपार्टमेंट और कॉलोनी में आने पर प्रतिबंध लगाकर इन्हें काम के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। यदि कोई परिवार इन्हें काम पर बुलाना चाहता है, तो भी रहवासी समिति अपनी मनमानी चलाते हुए इन महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए हुए हैं। इन्हें कोरोना फैलाने के कारक बताकर रोका जा रहा है।
महिलाओं से बातचीत के आधार पर अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की राज्य अध्यक्ष नीना शर्मा ने कहा कि बच्चों के मामा और महिलाओं के भाई कहलाना पसंद करने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन महिलाओं के तकलीफ के प्रति असंवेदनशील है। प्रदेश की लाखों घरेलू कामगार महिलाओं के प्रति सरकार और प्रशासन का उदासीन रवैया यह दिखाता है कि सरकार महिला हितैषी होने का दिखावा करती है, जबकि वह महिला विरोधी है। हमारी मांग है कि सरकार घरेलू कामगार महिलाओं के खाते में तीन महीने तक 10 हजार रुपए का सहयोग करे और इनके काम पर रहवासी समितियों द्वार लगाई जा रही रोक के खिलाफ दिशानिर्देश जारी करे।
राज्य महासचिव शैला शुक्ला ने बताया कि उन्होंने विभिन्न जिलों में कलेक्टर और संबंधित अधिकारियों को एक ज्ञापन देकर इन घरेलू कामगार महिलाओं के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने की मांग की है। उसमें घरेलू कामगार महिला की सेवाओं को आवश्यक सेवाओं की सूची में शामिल करने, किसी भी रहवासी समिति द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को कैम्पस, अपार्टमेंट एवं कॉलोनी में आने-जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाने, रहवासी समितियों द्वारा लिफ्ट के उपयोग पर रोक या अन्य भेदभाव वाले नियम नहीं थोपे जाने, यदि कोई परिवार अपने निर्णय के आधार पर किसी घरेलू कामगार महिला को काम पर बुलाना चाहता है, तो उस पर रहवासी समिति रोक नहीं लगा लगाने और भेदभावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की गई है। यह कहा गया है कि घरेलू कामगार महिला हर घर में प्रवेश के साथ ही सबसे पहले हाथ धुलाई करे एवं सर्दी, खांसी, बुखार होने पर काम पर न आए और कंटेंमेंट क्षेत्र से कोई घरेलू कामगार महिला काम के लिए नहीं आए और न ही किसी कंटेंमेंट क्षेत्र में काम के लिए जाए।
इस संदर्भ में अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की उपाध्यक्ष संध्या शैली का कहना है कि घरेलू कामगार महिलाएं अपनी आजीविका से अपने घर का खर्च उठाने के साथ अपने बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य को सुनिश्चित करती हैं। दफ्तर, व्यापार एवं उद्योग शुरू हो जाने के बाद कामकाजी महिलाओं के लिए घर और दफ्तर संभालने में परेशानी होने लगी है। बीमार और बुजुर्ग जो घरों पर सहायक या सहायिका रख पाने में सक्षम नहीं थे, वे भी अनलॉक में इन्हें काम पर बुलाना चाहते हैं। गृह कार्य में लगी महिलाओं को अब पुरुषों से घर के काम में अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। इसके बावजूद घरेलू कामगार महिला को कॉलोनी, अपार्टमेंट या कैम्पस में काम पर आने से रोकना पितृ सत्तात्मक सोच को दर्शाता है, जिसमें माना जाता है कि महिलाएं तो घर का काम कर ही लेगी, क्योंकि अधिकांश रहवासी समितियों में पुरुष ही काबिज हैं।

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