चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि : उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम लखनऊ एवं जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘वेद, उपनिषद एवं भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन और अनुप्रयोग’ विषय पर पांच दिवसीय राष्ट्रीय प्रमाणपत्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में महर्षि पाणिनि विश्वविद्यालय उज्जैन के आचार्य प्रो. तुलसीदास परौहा ने कहा कि आज आवश्यकता पढ़े हुए ज्ञान को आचरण में उतारने की है। भारतीय वाङ्मय में ज्ञान और आचरण का विशुद्ध समन्वय मिलता है। वर्तमाना पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों और उनके अनुप्रयोग से जुड़ी अध्ययन सामग्री को शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने गुरुकुल परंपरा को उत्तम नागरिक निर्माण की आधारशिला बताते हुए भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का उदाहरण
दिया। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा व्यक्ति को धर्म और संस्कृति से जोड़ती है। आज बढ़ते मनोविकारों का एक कारण अपनी ज्ञान परंपरा के मूल स्वरूप से दूरी भी है। भारतीय वाङ्मय में प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का समृद्ध ज्ञान मौजूद है, जिसे अध्ययन और अनुप्रयोग के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। आयोजन सचिव डॉ. शशिकांत त्रिपाठी ने कहा कि वेद-उपनिषद के साथ आयुर्वेद, चिकित्सा शास्त्र और बाइनरी अंक पद्धति भी भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा हैं। कहा कि उपनिषद आत्मिक ज्ञान का प्रकाश करते हैं तथा वेदों के द्वारा प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करके हम जीवन उपयोग का सही परिचय देते हैं। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग प्रभारी डॉ. प्रमिला मिश्रा और धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग प्रभारी डॉ. शांत कुमार चतुर्वेदी ने किया। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के निजी सचिव रमापति मिश्र, हमीरपुर से प्रोफेसर उमाशंकर त्रिपाठी, अधिष्ठाता डॉ महेंद्र कुमार उपाध्याय, डॉ अमित अग्निहोत्री, डॉ निहार रंजन मिश्र, डॉ रमा सोनी, डॉ आनंद कुमार, डॉ नीतू तिवारी, डॉ रवि प्रकाश शुक्ल, डॉ सुनीता श्रीवास्तव, डॉ दलीप कुमार, डॉ दुर्गेश कुमार मिश्र, डॉ संध्या पांडेय, डॉ सुशील त्रिपाठी, डॉ हरिकांत मिश्रा, डॉ रजनीश कुमार सिंह, डॉ भविष्या माथुर, सूर्य प्रकाश मिश्र, डॉ सुमेरी लाल, डॉ रवि प्रकाश चैधरी आदि मौजूद रहे।


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